बरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक
का आलेख
शास्त्र और परंपराएं कहती हैं कि श्राद्ध मृत्यु के बाद दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और तर्पण का विधान है। लेकिन आज का आधुनिक समाज एक घिनौने विरोधाभास में जी रहा है—शास्त्रों से मृत्यु के बाद के कर्मकांड तो बड़ी बारीकी से उठा लिए गए, लेकिन जिस ‘श्रद्धा’ पर यह परंपरा टिकी थी, वही श्रद्धा जीवित माता-पिता के लिए दिलों से गायब हो चुकी है।
आज शहर-शहर खुलते वृद्धाश्रम केवल एक सामाजिक व्यवस्था का बदलाव नहीं हैं; यह हमारे आधुनिक समाज की उस नग्न क्रूरता का सबूत हैं, जहाँ रिश्ते अब जरूरतों की तौल पर तय होते हैं।
जिस मां-बाप ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों का भविष्य गढ़ने में खपा दी, अपनी हर ख्वाहिश का गला घोंटकर औलाद की फरमाइशें पूरी कीं, बुढ़ापे में वही मां-बाप अपने ही बनाए घर में एक ‘फालतू सामान’ की तरह कोने में ढकेल दिए जाते हैं। आधुनिकता ने हमें बड़े मकान, चमचमाती गाड़ियां और मोटा बैंक बैलेंस तो दे दिया, लेकिन हमारी संवेदनाएं इतनी बौनी कर दीं कि ढलती उम्र में मां-बाप का सहारा बनना हमें ‘बोझ’ लगने लगा। इसी संवेदनहीनता का नतीजा है कि अनगिनत बुजुर्ग अपनी जिंदगी की आखिरी सांसें वृद्धाश्रम की ठंडी और अनजान दीवारों के बीच अपनों का रास्ता तकते हुए छोड़ देते हैं।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए—
जो औलाद जीते-जी अपने बूढ़े मां-बाप को दो पल का वक्त नहीं दे पाती, बीमारी में एक गिलास पानी देने में कतराती है और अंत में उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ आती है; वही औलाद उनके गुजरने के बाद पितृपक्ष में बड़े भक्तिभाव से श्राद्ध का नाटक करती है।
पंडितों का हुजूम बुलाया जाता है, छप्पन भोग सजाए जाते हैं, दान-पुण्य के ढोल पीटे जाते हैं और समाज के सामने यह साबित करने की होड़ मचती है कि पितृ-ऋण चुका दिया गया।
लेकिन यहाँ समाज के मुंह पर एक सीधा और तीखा सवाल उछालना जरूरी है:
क्या उस मृत पिता की आत्मा उस छप्पन भोग को स्वीकार करेगी, जिसे देने वाले हाथों ने जीते-जी उन्हें एक सूखी रोटी भी इज्जत से न दी हो?
क्या मरने के बाद पंडितों को कराए गए भोजन से उस मां की आत्मा को तृप्ति मिलेगी, जो जीते-जी अपनी ही औलाद के हाथों उपेक्षा और तन्हाई के आंसू बहाती रही?
यह सवाल किसी धर्म, शास्त्र या परंपरा पर हमला नहीं है—यह प्रहार उस पाखंड पर है जो आज हमारी आदत बन चुका है। सनातन परंपरा में ‘जीवित पितृ पूजा’ को सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। जब तक माता-पिता सांस ले रहे हैं, वही साक्षात ईश्वर हैं। उनकी सेवा, उनके आत्मसम्मान की रक्षा और उनकी लाचारी में उनके साथ मजबूती से खड़े रहना ही सबसे सच्चा धर्म है।
अगर जीते-जी माता-पिता के हिस्से सिर्फ तिरस्कार, उपेक्षा और वृद्धाश्रम का एकांत आया, तो मरने के बाद किया गया विशाल श्राद्ध-भोज केवल एक आडंबर है—समाज को ठगने का छलावा और अपनी आत्मग्लानि को छिपाने की नाकाम कोशिश।
मां-बाप की सेवा कोई सालाना कर्मकांड नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है:
उनके पास बैठकर दो पल दिल से उनका हाल पूछ लेना।
वक्त पर उनकी दवा और जरूरतों का ख्याल रख लेना।
उनकी बातों को चिढ़ने के बजाय सब्र से सुन लेना।
और सबसे बढ़कर, उन्हें अहसास दिलाना कि वे आज भी परिवार की नींव हैं, कोई फालतू हिस्सा नहीं।
बुढ़ापे में बुजुर्गों को संपत्ति या महंगे उपहार नहीं चाहिए; उन्हें सिर्फ अपनों का साथ, आदर और थोड़ा सा प्रेम चाहिए।
याद रखिए, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को जो दिखा रहे हैं, वही काटेंगे। अगर आज बच्चे घर के दादा-दादी को उपेक्षित होते या वृद्धाश्रम जाते देखेंगे, तो कल वे भी अपने मां-बाप के साथ वही करेंगे। बच्चे हमारी नसीहतों से नहीं, हमारे आचरण से सीखते हैं।
मृत्यु के बाद श्राद्ध की थाली में कितने पकवान सजे थे, इससे ईश्वर के दरबार में कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ इससे पड़ता है कि जब मां-बाप जिंदा थे, तब उनकी थाली में और उनके जीवन में हमारा कितना प्यार था।
मरे हुए लोगों के नाम का दिखावा सिर्फ दुनिया देख सकती है, लेकिन जिंदा मां-बाप की सच्ची सेवा सीधे ईश्वर के दरबार में दर्ज होती है।




