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छोटे कुनबे और सिमटती खेती: गांवों में छाई वीरानी, वैस्ट यूपी में बदला परिवार का स्वरूप; खेतों में मशीनें बढ़ीं, पर रिश्तों की रौनक घटी

वेब वार्ता
अमरोहा, 06 अक्टूबर ।कभी आठ-नौ बच्चों वाले विशाल किसान परिवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों की मुख्य पहचान हुआ करते थे, लेकिन जमीन के लगातार बंटवारे, सीमित कृषि जोत और बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता ने अब ग्रामीण समाज की सोच को पूरी तरह बदल दिया है। गांवों में अब एक या दो बच्चों वाले परिवार सामान्य दिखाई देते हैं और कई लोग एक बेटा-एक बेटी को ही संतुलित परिवार मानते हैं। इसी बदलती सोच के बीच मुरादाबाद, मेरठ और सहारनपुर मंडलों के चुनिंदा गांवों में हुई बातचीत पर आधारित सर्वे में शामिल पुरुषों में से करीब 62 प्रतिशत ने कहा कि गांव की चहल-पहल बीते दिनों की बात रह गई हैं।
​स्थानीय स्तर पर किसानों और ग्रामीण परिवारों से हुई बातचीत में मुरादाबाद के अशोक गुर्जर पटेल, अमरोहा के देहरा चक निवासी चौधरी परविंदर सिंह, चौधरी नरेश सिंह, देहरी गांव के कैलाश गुर्जर , मुकीमपुरा के अमरपाल सैनी, मोहद्दीनपुर के जितेंद्र कटारिया, गजरौला के जयकरण सैनी, चकनवाला के महाशय जयचंद व जैनुल आबेदीन, तिगरिया भूड़ के रणबीर सिंह, मुरादपुर के सोनू तथा अफजलपुर के रामौतार सैनी तथा मलेशिया के महावीर सिंह यादव समेत कई किसानों ने परिवार के घटते आकार और खेती पर पड़ रहे उसके दूरगामी असर की तस्वीर सामने रखी। बिजनौर के मास्टर राजपाल सिंह और डॉ. मनोज कटारिया, संभल के चौधरी रामपाल सिंह, रामपुर के राजेश गंगवार, सहारनपुर मंडल के देवबंद ब्लाक प्रमुख रहे चतर सिंह परिवार के प्रसिद्ध गांव मिरगपुर निवासी डॉ विजय पंवार, रामपुर मनिहारान के राजीव पंवार, मुकुल पंवार, बागपत जिले के बोढ़ा गांव निवासी मास्टर वेदप्रकाश एवं पधान कुलदीप सिंह तथा मेरठ के बड़े किसान रणसिंह एडवोकेट से हुई बातचीत में भी छोटे परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति पर विस्तृत चर्चा हुई।
​किसानों के मुताबिक पहले ज्यादा बच्चे होने का मतलब खेत और पशुपालन के कामों के लिए घर में अधिक हाथ होना था। अब परिवार छोटे हो गए हैं और बच्चे पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में शहरों का रुख कर रहे हैं, जिससे पैतृक खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है और पारिवारिक श्रम की कमी को पूरा करने के लिए बाहरी तथा प्रवासी मजदूरों पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है।
​हापुड़ जिले में सिंभावली क्षेत्र के पूर्व ब्लॉक प्रमुख महाराज सिंह के परिवार का उदाहरण गांव से शहर की ओर बढ़ते इस बदलाव को साफ दिखाता है, जिनकी नई पीढ़ी दिल्ली, गाजियाबाद और मुंबई जैसे बड़े शहरों में बस चुकी है। लोनी (गाजियाबाद) ब्लाक प्रमुख रहे महाराज सिंह परिवार के सुरेश, तपसी कसाना तथा राजकुमार मेरठ के नजदीक पांचली गांव में सतबीर सिंह, ओमबीर सिंह, पूर्व प्रधान अनिल सिंह, हापुड़ जिले के बड़े गांव नानपुर नंबरदार छतरसिंह परिवार के योगेन्द्र सिंह, ऋषिपाल सिंह, राजपुर मंडैय्या निवासी हरबीर सिंह, प्रधान देवेंद्र सिंह, रविंद्र चौधरी और गोहरा मुदाफरा के वीर सिंह समेत ग्रामीणों के अनुसार गांवों में जमीन और मकान तो बचे हैं, लेकिन युवा शहरों में चले गए हैं। इससे गांवों में रिश्तेदारी और आपसी सामाजिक मेलजोल का पुराना स्वरूप भी बदल रहा है और गांव के द्वार सूने नजर आने लगे हैं।
​किसानों के अनुसार छोटे परिवार अपनाने की एक बड़ी वजह जमीन का लगातार होता बंटवारा भी है। आठ-दस बच्चों के बीच कृषि भूमि बंटने पर जोत बेहद छोटी हो जाती है, जिससे खेती से परिवार की जरूरतें पूरी करना बेहद कठिन हो जाता है। इसी सामाजिक और आर्थिक बदलाव के बीच बातचीत में नई रुचि दिखाई दी है। स्थानीय सर्वे में शामिल पुरुषों के एक बड़े हिस्से ने कहा है कि छोटे परिवारों की वजह से चिंतित लोगों में गांवों के बदलते स्वरूप को लेकर गहन विचार मंथन शुरू हो गया है।

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