कोलकाता/अलीगढ़, 04 जून (वेब वार्ता)। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. शंभुनाथ तिवारी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म आम हिंदुस्तानियों की मूकवेदना को स्वर देने के उद्देश्य से हुआ था। उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रथम समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ ने न केवल हिंदी पत्रकारिता की दिशा निर्धारित की, बल्कि हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की आधारभूमि तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय चौथी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में एक अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि वर्ष 1826 में प्रकाशित ‘उदंत मार्तंड’ उस समय सामने आया, जब हिंदी भाषा का स्वरूप अभी विकसित हो रहा था। पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने इसे ‘हिंदुस्तानियों के हित हेतु’ प्रकाशित किया और यही कारण है कि इसे हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत का आधार माना जाता है।
उन्होंने कहा कि हिंदी की आरंभिक खड़ी बोली उस दौर में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की प्रक्रिया में थी। ऐसे समय में ‘उदंत मार्तंड’ ने जनसामान्य की आवाज बनकर पत्रकारिता की उस परंपरा की नींव रखी, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती प्रदान की।
प्रो. तिवारी ने कहा कि यह सुखद संयोग है कि हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर यह आयोजन कोलकाता में हो रहा है, जहां से हिंदी पत्रकारिता का प्रथम प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। उन्होंने कहा कि बंगाल की धरती भारतीय समाज में सामाजिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक नवजागरण और सांस्कृतिक विकास की साक्षी रही है तथा हिंदी पत्रकारिता के विकास में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उन्होंने कहा कि परतंत्र भारत में हिंदी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। तमाम चुनौतियों और प्रताड़नाओं के बावजूद पत्रकारिता ने अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान दिया।
‘उदंत मार्तंड’ के अल्पकालिक प्रकाशन काल का उल्लेख करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति या संस्था का मूल्यांकन उसकी अवधि से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव और सार्थकता से किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भले ही ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन काल लगभग डेढ़ वर्ष रहा, लेकिन इसने हिंदी पत्रकारिता की ऐसी मशाल जलाई, जिसकी रोशनी आज भी दिखाई देती है।
उन्होंने अतीत के अध्ययन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि वर्तमान को समझने और भविष्य की संभावनाओं का आकलन करने के लिए इतिहास की ओर देखना आवश्यक है। उनके अनुसार, अतीत का गंभीर अध्ययन ही समाज और पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान कर सकता है।
दो दिवसीय इस संगोष्ठी का आयोजन भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद और कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा परिषद के अध्यक्ष प्रो. विनोदकुमार मिश्र, महासचिव प्रो. संजीवकुमार दुबे तथा कोषाध्यक्ष प्रो. राजेशकुमार पासवान ने तैयार की। आयोजन के स्थानीय संयोजन की जिम्मेदारी कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्य प्रो. सत्या उपाध्याय और उनकी टीम ने निभाई।
संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से आए विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं ने भाग लिया तथा हिंदी पत्रकारिता के विविध आयामों पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर ‘हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान’ शीर्षक पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया।




