नई दिल्ली, 16 जून (वेब वार्ता)। केंद्र सरकार ने दवाओं के दुरुपयोग पर रोक लगाने और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अब खांसी, सर्दी, बुखार अथवा अन्य बीमारियों में उपयोग की जाने वाली किसी भी प्रकार की सिरप बिना डॉक्टर की वैध पर्ची के मेडिकल स्टोर से नहीं खरीदी जा सकेगी।
सरकार ने दवा नियम, 1945 में संशोधन करते हुए अनुसूची ‘के’ से ‘सिरप’ शब्द को हटा दिया है। इसके साथ ही सिरप की बिना पर्ची बिक्री को मिली हुई छूट समाप्त हो गई है। अब इन दवाओं की बिक्री केवल पंजीकृत चिकित्सक द्वारा जारी वैध पर्ची के आधार पर ही की जा सकेगी।
दवाओं के अनियंत्रित उपयोग पर लगेगी रोक
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का सेवन गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। स्वयं उपचार की प्रवृत्ति के कारण दवाओं का गलत उपयोग बढ़ा है, जिससे दुष्प्रभाव और जटिलताओं की आशंका बनी रहती है।
हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में दूषित कफ सिरप के सेवन से बच्चों की मौत की घटनाओं ने भी चिंता बढ़ाई थी। इन घटनाओं के बाद दवाओं की गुणवत्ता, वितरण व्यवस्था और बिक्री प्रणाली को लेकर निगरानी सख्त करने की मांग तेज हुई थी। सरकार का मानना है कि नया नियम मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में प्रभावी कदम साबित होगा।
मेडिकल स्टोर संचालकों के लिए सख्त निर्देश
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की ओर से जारी आदेश के बाद देशभर के मेडिकल स्टोर संचालकों को संशोधित नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। बिना वैध चिकित्सकीय पर्ची के सिरप बेचने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह संशोधन आम जनता, विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों एवं आपत्तियों पर विचार करने के बाद अंतिम रूप से अधिसूचित किया गया है। अधिसूचना जारी होने के साथ ही इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।
मरीजों को क्या करना होगा?
नए नियम के तहत अब मरीजों को किसी भी प्रकार की सिरप खरीदने से पहले चिकित्सक से परामर्श लेना होगा और उनकी ओर से जारी वैध पर्ची प्रस्तुत करनी होगी। सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा मिलेगा और अनावश्यक अथवा गलत दवा सेवन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दवा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, दवाओं के दुरुपयोग को रोकने और आम नागरिकों के स्वास्थ्य हितों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है।




