पैकेज्ड फूड पर लाल चेतावनी को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एफएसएसएआई से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 12 सितंबर (वेब वार्ता)। पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर सामने चेतावनी लेबल लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण से स्पष्ट जवाब मांगा है। न्यायालय ने पूछा है कि चीनी, नमक, सोडियम, पोटैशियम और संतृप्त वसा की वह निश्चित सीमा क्या होगी, जिसके पार किसी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ पर लाल चेतावनी चिह्न लगाना अनिवार्य किया जाएगा।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने खाद्य नियामक से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि किसी खाद्य उत्पाद को ‘अधिक चीनी’, ‘अधिक नमक’ या ‘अधिक वसा’ वाला मानने के लिए क्या वैज्ञानिक आधार और निर्धारित मानक मौजूद हैं। न्यायालय ने प्रस्तावित सीमाओं के पीछे वैज्ञानिक आधार का विवरण भी मांगा है।

क्या है पूरा मामला?

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर सामने चेतावनी लेबल लगाने की नीति को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है। एफएसएसएआई ने शुरुआती प्रस्ताव में इसे दो चरणों में लागू करने की बात कही थी।

प्रस्ताव के पहले चरण में लाल रंग के छह कोनों वाले चेतावनी चिह्न को उन पैकेटों पर लगाने की बात थी, जिनमें चीनी, नमक या संतृप्त वसा में से कम से कम दो घटक निर्धारित सीमा से अधिक हों।

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इसे दो चरणों में लागू करने की आवश्यकता क्यों है। न्यायालय का रुख था कि यदि चीनी, नमक या वसा में से किसी एक की मात्रा ही निर्धारित सीमा से अधिक है तो उपभोक्ता को इसकी जानकारी चेतावनी चिह्न के माध्यम से दी जानी चाहिए।

न्यायालय के रुख के बाद एफएसएसएआई ने अदालत को बताया कि वह शुरुआत से ही अधिक सख्त व्यवस्था लागू करने और चीनी, नमक या वसा में से किसी एक घटक की निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा होने पर भी लाल चेतावनी चिह्न लगाने के विकल्प पर विचार करने के लिए तैयार है।

100 ग्राम या एक बार में खाई जाने वाली मात्रा?

चेतावनी की सीमा निर्धारित करने के तरीके को लेकर भी बहस सामने आई है। खाद्य विनिर्माता संगठनों ने सवाल उठाया है कि उत्पाद में पोषक तत्वों की मात्रा का आकलन 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर के आधार पर क्यों किया जाए।

खाद्य कंपनियों का तर्क है कि अचार और सॉस जैसे उत्पादों का सेवन आमतौर पर एक बार में 100 ग्राम नहीं किया जाता। इनकी वास्तविक खपत काफी कम मात्रा में होती है। इसलिए कंपनियों का कहना है कि चेतावनी निर्धारित करते समय एक बार में ली जाने वाली मात्रा यानी परोसने की मात्रा को आधार बनाया जाना चाहिए।

वहीं, एफएसएसएआई के प्रस्तावित नियमों में ठोस खाद्य पदार्थों के लिए 100 ग्राम और तरल खाद्य पदार्थों के लिए 100 मिलीलीटर को आधार माना गया है। इसी आधार पर चीनी, नमक और संतृप्त वसा की मात्रा का आकलन किए जाने का प्रस्ताव है।

वैज्ञानिक आधार स्पष्ट करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई से पूछा कि किसी उत्पाद को ‘अधिक चीनी’ या ‘अधिक नमक’ वाला घोषित करने के लिए कौन से स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए गए हैं।

एफएसएसएआई ने बताया कि संबंधित सीमाएं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पोषण संस्थान की वर्ष 2024 की आहार संबंधी दिशा-निर्देशों के आधार पर तय की जाएंगी।

न्यायालय ने इन दिशा-निर्देशों के तहत अलग-अलग प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और मीठे पेय पदार्थों के लिए निर्धारित सीमाओं का विस्तृत ब्योरा मांगा है। इससे यह स्पष्ट होगा कि विभिन्न श्रेणियों के खाद्य पदार्थों में चेतावनी चिह्न लगाने की सीमा किस वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित की जाएगी।

लाल रंग के चेतावनी चिह्न पर भी सवाल

प्रस्तावित चेतावनी चिह्न के रंग को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई से पुनर्विचार करने को कहा है। एफएसएसएआई ने लाल रंग के छह कोनों वाले चिह्न का प्रस्ताव रखा था।

न्यायालय ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारत में लाल रंग को अक्सर मांसाहारी खाद्य पदार्थों और हरे रंग को शाकाहारी खाद्य पदार्थों से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में शाकाहारी खाद्य पदार्थों के पैकेट पर लाल रंग का चेतावनी चिह्न उपभोक्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है।

न्यायालय ने एफएसएसएआई से चेतावनी चिह्न के लिए रंग के विकल्प पर दोबारा विचार करने को कहा है। इस पहल का उद्देश्य एक ओर उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों में मौजूद अधिक चीनी, नमक और वसा के बारे में स्पष्ट जानकारी देना है, वहीं दूसरी ओर लेबल ऐसा हो जिससे उसके अर्थ को लेकर किसी तरह की गलतफहमी न हो।

उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी देने पर जोर

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर सामने चेतावनी लेबल लगाने का उद्देश्य उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदते समय उसके पोषण संबंधी गुणों की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना है। मौजूदा मामले में न्यायालय का जोर इस बात पर है कि चेतावनी के लिए निर्धारित सीमा स्पष्ट, वैज्ञानिक आधार पर आधारित और उपभोक्ताओं के लिए समझने में आसान हो।

अब एफएसएसएआई की ओर से चीनी, नमक और वसा की प्रस्तावित सीमाओं तथा उनके वैज्ञानिक आधार का विस्तृत विवरण सामने रखे जाने के बाद इस नीति की दिशा और स्पष्ट होने की उम्मीद है। साथ ही चेतावनी चिह्न के रंग और उसे लागू करने के चरणों पर भी आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

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