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भारत रूस से कितना तेल खरीद रहा है? 100% अमेरिकी शुल्क लगा तो क्या होगा असर

नई दिल्ली, 10 अगस्त (वेब वार्ता)। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत एक बार फिर अमेरिकी दबाव के केंद्र में है। अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान रखने वाले विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया है। इसमें राष्ट्रपति को कुछ देशों के आयात पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव है। हालांकि, यह प्रावधान अभी कानून नहीं बना है और अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी तथा आगे की प्रक्रिया बाकी है।

इस बीच भारत के रूस से तेल आयात का स्तर काफी ऊंचा बना हुआ है। जून 2026 में भारत ने रूस से औसतन करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जो उस अवधि में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 53.5 प्रतिशत था। यह रूस को भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनाता है।

भारत रूस से रोज कितना तेल खरीदता है?

उपलब्ध जहाज-आवागमन आंकड़ों के अनुसार, जून में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात औसतन करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। पूरे जून के लिए रूस से आयात 23.5 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक रहने का अनुमान लगाया गया था। यह मई 2023 के पिछले मासिक उच्च स्तर को भी पार करने वाला आंकड़ा था।

रूसी तेल की खरीद में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत और भारतीय रिफाइनरियों की मांग रही है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल पर कई मौकों पर छूट उपलब्ध हुई, जिसका भारतीय कंपनियों ने फायदा उठाया।

100 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क क्या है?

अमेरिकी सीनेट से पारित प्रस्ताव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू हो चुका है। विधेयक को आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी और अन्य विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

इसलिए फिलहाल इसे संभावित अमेरिकी कार्रवाई के तौर पर देखना चाहिए, न कि भारत पर लागू हो चुके नए 100 प्रतिशत शुल्क के रूप में।

भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?

यदि अमेरिका भारत के उत्पादों पर इतना भारी अतिरिक्त शुल्क लगाता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा। इससे अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।

कपड़ा, तैयार परिधान, इंजीनियरिंग सामान, रत्न एवं आभूषण तथा अन्य निर्यात आधारित क्षेत्रों को इसका असर झेलना पड़ सकता है। इससे भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और निर्यातकों के सामने अमेरिकी खरीदारों के साथ कीमत बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

हालांकि, शुल्क का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में इसका स्वरूप क्या रहता है, किन वस्तुओं पर शुल्क लगाया जाता है और अमेरिकी प्रशासन इसका इस्तेमाल किस तरह करता है।

क्या पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे?

सीधा असर जरूरी नहीं है। अमेरिका की ओर से भारतीय वस्तुओं पर लगाया जाने वाला शुल्क सीधे पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमत निर्धारित नहीं करता।

लेकिन अगर अमेरिकी दबाव के कारण भारत रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती करता है और उसकी जगह अपेक्षाकृत महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ता है, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत भी बढ़ती है तो दबाव और बढ़ सकता है।

दूसरी ओर, भारत के पास रूस के अलावा पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य उत्पादक देशों से तेल खरीदने के विकल्प मौजूद हैं। इसलिए केवल अमेरिकी शुल्क के आधार पर तत्काल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।

रूस का तेल भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमत और आपूर्ति के स्रोत देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंध और मूल्य संबंधी सीमाएं लगाए जाने के बाद रूसी कच्चा तेल कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में छूट पर उपलब्ध हुआ। भारतीय रिफाइनरियों ने इस अवसर का इस्तेमाल किया और रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया।

जून 2026 में रूस की हिस्सेदारी भारत के कच्चे तेल आयात में आधे से अधिक पहुंच गई थी।

रूसी तेल कितना सस्ता मिलता है?

रूसी तेल की छूट स्थायी नहीं होती। यह वैश्विक मांग, प्रतिबंधों, माल ढुलाई, बीमा, आपूर्ति मार्ग और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि रूसी तेल हमेशा किसी निश्चित राशि से सस्ता मिलता है। जून में रूसी आपूर्ति मजबूत रहने के पीछे छूट और रिफाइनरी मांग दोनों महत्वपूर्ण कारक बताए गए थे।

क्या भारत तुरंत दूसरे देशों से तेल खरीद सकता है?

हां, लेकिन पूरी मात्रा तुरंत बदलना आसान नहीं होगा। भारत इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और अन्य देशों से कच्चा तेल खरीदता है। इसलिए रूस से आपूर्ति घटने पर विकल्प मौजूद हैं।

लेकिन इतनी बड़ी मात्रा को अचानक दूसरे स्रोतों से बदलने पर माल ढुलाई, बीमा, खरीद मूल्य और रिफाइनिंग की लागत प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा अलग-अलग रिफाइनरियों की तकनीकी संरचना भी इस बात को प्रभावित करती है कि वे किस प्रकार का कच्चा तेल कितनी मात्रा में इस्तेमाल कर सकती हैं।

क्या भारत अमेरिकी दबाव में रूस से तेल खरीदना बंद करेगा?

फिलहाल ऐसा कोई निश्चित संकेत नहीं है कि भारत रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने जा रहा है। भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हित दोनों हैं।

इसके साथ ही भारत अपने तेल आयात के स्रोतों में विविधता भी बढ़ा रहा है। हालिया परिस्थितियों में पश्चिम एशिया और अन्य क्षेत्रों से आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

मौजूदा स्थिति में भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर संतुलन बनाना होगा। पहला, देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए पर्याप्त और सस्ता कच्चा तेल सुनिश्चित करना। दूसरा, अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार के साथ संबंधों को प्रभावित होने से बचाना। तीसरा, रूस से तेल खरीद को लेकर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों के आर्थिक प्रभाव को सीमित करना।

अमेरिकी सीनेट से पारित विधेयक ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है, लेकिन अभी 100 प्रतिशत शुल्क भारत पर लागू नहीं हुआ है। आने वाले चरण में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की भूमिका और ट्रंप प्रशासन का रुख यह तय करेगा कि भारत के लिए वास्तविक खतरा कितना बड़ा बनता है।

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