कोलकाता, 20 सितंबर (वेब वार्ता)। पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य मंत्री शरद्वत मुखोपाध्याय के देहदान को लेकर दिए गए बयान पर विवाद खड़ा हो गया है। न्यूटाउन में आयोजित नेत्रदान जागरूकता कार्यक्रम के दौरान मंत्री ने लोगों से पूर्ण देहदान के बजाय अंगदान को प्राथमिकता देने की अपील की। उनके इस बयान पर राज्य के कई चिकित्सकों और देहदान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई है।
अंगदान को बताया समय की जरूरत
कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अंगदान के माध्यम से जरूरतमंद मरीजों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अंगदान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
मंत्री ने यह भी दावा किया कि आधुनिक तकनीक के विकास के कारण शव विच्छेदन की आवश्यकता पहले जैसी नहीं रह गई है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के देहदान का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि मस्तिष्क की मृत्यु के समय उनके अंगदान किए जाते, तो उनका अधिक चिकित्सकीय उपयोग हो सकता था।
चिकित्सकों ने कहा—देहदान का महत्व अब भी बरकरार
देहदान आंदोलन से जुड़े लोगों और चिकित्सकों ने मंत्री के बयान पर असहमति जताई है। उनका कहना है कि अंगदान और देहदान दोनों की उपयोगिता अलग-अलग है तथा एक को दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता।
चिकित्सकों के अनुसार, अंगदान से गंभीर रूप से बीमार मरीजों का जीवन बचाने में मदद मिलती है, जबकि देहदान के माध्यम से मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना समझने और चिकित्सकीय प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि एमबीबीएस की पढ़ाई में शव विच्छेदन आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उनका तर्क है कि आभासी तकनीक और डिजिटल मॉडल मानव शरीर के वास्तविक अध्ययन का पूरी तरह विकल्प नहीं बन सकते। इसलिए चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में देहदान की आवश्यकता अब भी बनी हुई है।




