कोलकाता, 18 सितंबर (वेब वार्ता)। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। आयोग ने आगामी विधानसभा उपचुनावों के मद्देनजर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। ममता बनर्जी ने अंतरिम व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करते हुए पार्टी की मूल पहचान और चुनाव चिह्न वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है।
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के नाम और चिह्न बदले
चुनाव आयोग ने गुरुवार रात जारी अपने अंतरिम आदेश में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद के बीच दोनों पक्षों को आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों में इनका इस्तेमाल नहीं करने का निर्देश दिया था।
आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया है। वहीं, अरूप रॉय के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम आवंटित किया गया है।
चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार, ममता गुट को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ और अरूप रॉय गुट को ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है। यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू की गई है।
मूल पहचान और चुनाव चिह्न वापस लेने की मांग
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि वह इस अंतरिम व्यवस्था को समझौते के रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। उन्होंने पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को वापस पाने के लिए संघर्ष जारी रखने का रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर चुनौती के माध्यम से ममता बनर्जी के पक्ष की ओर से चुनाव आयोग के आदेश की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और न्यायालय का रुख विवाद के समाधान की दिशा तय करेगा।
छह अक्टूबर को होने हैं विधानसभा उपचुनाव
पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर छह अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं। इनमें पूर्व मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम और मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर विधानसभा सीट शामिल हैं। दोनों सीटों के लिए मतगणना नौ अक्टूबर को निर्धारित है।
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को शुक्रवार सुबह तक अपनी पसंद के नाम और चुनाव चिह्न बताने का निर्देश दिया था, ताकि आगामी उपचुनावों के लिए चुनावी प्रक्रिया प्रभावित न हो।
आयोग ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित पार्टी का नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ से मिलता-जुलता हो सकता है, जबकि चुनाव चिह्न निर्दलीय उम्मीदवारों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए अधिसूचित उपलब्ध चिह्नों की सूची में से चुना जाना आवश्यक है।
चुनाव चिह्न आदेश के तहत अंतिम निर्णय लंबित
चुनाव आयोग ने बताया कि ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के अनुच्छेद 15 के तहत विवाद का अंतिम निपटारा करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं था। हालांकि, आगामी उपचुनावों में उम्मीदवारों और दलों की चुनावी पहचान की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अंतरिम व्यवस्था लागू की गई है।
आयोग के अनुसार, यह व्यवस्था विशेष रूप से आगामी उपचुनावों के लिए है और तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक कि संबंधित प्रावधानों के तहत पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद का अंतिम समाधान नहीं हो जाता।
विधानसभा चुनाव के बाद बढ़ा था पार्टी में विवाद
चुनाव आयोग का यह आदेश मई में हुए विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस में सामने आए आंतरिक मतभेदों और बगावत की पृष्ठभूमि में आया है।
जून में 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार शोभनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया था। विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता मिलने के बाद यह घटनाक्रम पार्टी के 28 वर्ष के इतिहास में विभाजन के संकेत के रूप में सामने आया।
इसके कुछ ही दिनों बाद पार्टी में जारी विवाद संसद तक पहुंच गया। वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 लोकसभा सदस्यों के एक समूह ने कथित तौर पर ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ का समर्थन किया और अलग गुट के रूप में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने की जानकारी दी।
इन घटनाक्रमों से तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक और संसदीय ढांचे में मतभेद और गहरे होने की बात सामने आई है। अब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद इस मामले पर न्यायिक निर्णय की प्रतीक्षा है।




