नई दिल्ली, 10 जून (वेब वार्ता)। किसी भी बड़े बदलाव के पीछे दूरदर्शी सोच, स्पष्ट रणनीति और जनसहभागिता की अहम भूमिका होती है। पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और कूटनीतिक क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। वर्ष 2014 में चुनौतियों से घिरे देश ने आज वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई है। समर्थक इसे परिवर्तनकारी नेतृत्व का उदाहरण मानते हैं, जबकि आलोचक इसकी दिशा और प्राथमिकताओं पर सवाल भी उठाते रहे हैं। बावजूद इसके, यह निर्विवाद है कि इस दौर ने भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था की कार्यशैली को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे चर्चित विशेषता ‘जनभागीदारी’ का मॉडल रहा। विकास को केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय आम नागरिकों को उसका सहभागी बनाने की कोशिश की गई। स्वच्छ भारत अभियान, जल संरक्षण अभियान, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और टीकाकरण जैसे कार्यक्रमों को जन आंदोलन का स्वरूप दिया गया। सरकार का मानना रहा कि नागरिकों की भागीदारी से योजनाओं की स्वीकार्यता और प्रभावशीलता दोनों बढ़ती हैं।
स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत करोड़ों शौचालयों का निर्माण किया गया और खुले में शौच मुक्त भारत का लक्ष्य सामने रखा गया। इसी प्रकार जल संरक्षण के लिए विभिन्न अभियानों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को जोड़ा गया। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देकर छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और ग्रामीण क्षेत्रों तक तकनीकी पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। आज भारत को डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में अग्रणी देशों में गिना जाता है।
आर्थिक मोर्चे पर वर्ष 2014 में धीमी वृद्धि दर, निवेशकों की चिंता और नीतिगत अनिश्चितता जैसी चुनौतियां मौजूद थीं। इसके बाद जनधन योजना, वस्तु एवं सेवा कर, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, मुद्रा योजना और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी पहलों को लागू किया गया। समर्थकों का दावा है कि इन सुधारों ने आर्थिक संरचना को मजबूती प्रदान की और भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं की कतार में खड़ा किया।
पहले कार्यकाल में वित्तीय समावेशन, डिजिटल बुनियादी ढांचे और कर सुधारों पर विशेष जोर दिया गया। जनधन खातों के माध्यम से बैंकिंग सेवाओं का विस्तार हुआ, जबकि वस्तु एवं सेवा कर के जरिए एकीकृत राष्ट्रीय बाजार की दिशा में कदम बढ़ाया गया। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया।
दूसरे कार्यकाल में देश को वैश्विक महामारी जैसी अभूतपूर्व चुनौती का सामना करना पड़ा। गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत करोड़ों लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया। इसी दौरान आधारभूत संरचना विकास, सैन्य सुधार और महिला प्रतिनिधित्व से जुड़े निर्णय भी चर्चा में रहे। अनुच्छेद 370 को हटाने और राम मंदिर निर्माण जैसे कदमों ने राजनीतिक विमर्श को भी प्रभावित किया।
तीसरे कार्यकाल में सरकार ने विकसित भारत के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों की गति बनाए रखने का संकेत दिया। कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार, आधारभूत संरचना परियोजनाओं और सामाजिक सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देने का प्रयास दिखाई दिया। हालांकि रोजगार, महंगाई और आय असमानता जैसे मुद्दे अब भी सार्वजनिक बहस के केंद्र में बने हुए हैं।
विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया। विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों को समानांतर रूप से मजबूत करते हुए भारत ने स्वयं को वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। मानवीय सहायता, आपदा राहत और स्वास्थ्य सहयोग के माध्यम से भी भारत की भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्र में भी नीति में बदलाव देखने को मिला। आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के साथ-साथ रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर बल दिया गया। घरेलू रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में कई कदम उठाए गए।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह दौर महत्वपूर्ण रहा। भारतीय जनता पार्टी का कई राज्यों में विस्तार हुआ और राष्ट्रीय राजनीति में उसका प्रभाव बढ़ा। हालांकि वर्ष 2024 के आम चुनाव परिणामों ने यह संकेत भी दिया कि मतदाता विकास, रोजगार और जीवन से जुड़े मूलभूत मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। इसके बाद सरकार की नीतियों में विकास आधारित विमर्श को और अधिक महत्व मिलने की चर्चा तेज हुई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल का मूल्यांकन विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है। एक पक्ष इसे निर्णायक नेतृत्व और परिवर्तनकारी शासन का दौर मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे गंभीर विमर्श और जवाबदेही की कसौटी पर परखने की आवश्यकता बताता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस अवधि ने भारत की राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका को नई दिशा देने का प्रयास किया है। आने वाले वर्षों में इन नीतियों का वास्तविक प्रभाव और उनका दीर्घकालिक परिणाम ही इस परिवर्तन की स्थायी तस्वीर प्रस्तुत करेगा।




