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दल बदला, हवा बदली, पर चेहरा वही: गोपामऊ के 15 साल और 2027 के सियासी सवाल

लक्ष्मीकान्त पाठक

हरदोई 22 सितम्बर (वेबवार्ता)राजनीति में अक्सर झंडे बदलते ही चेहरे भी बदल जाते हैं, लेकिन गोपामऊ विधानसभा सीट की कहानी पिछले तीन चुनावों से एक अलग ही तस्वीर पेश कर रही है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सुरक्षित सीट (संख्या 157) पर 2012 में श्याम प्रकाश सपा के टिकट पर जीते। 2017 में वे भाजपा के साथ मैदान में उतरे और 2022 में भी भाजपा के टिकट पर ही विधानसभा पहुंचे। यानी दल बदला, चुनावी हवा बदली और जीत का अंतर भी बदला—लेकिन विधायक का चेहरा नहीं बदला। अब 2027 के चुनाव की आहट के साथ ही यही निरंतरता कई नए सियासी सवाल खड़े कर रही है।

1. 3 चुनाव, 3 जनादेश: जीत का अंतर 31 हजार से घटकर 7 हजार पर क्यों आया?

पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े दर्शाते हैं कि गोपामऊ में भले ही विजेता का चेहरा एक रहा हो, लेकिन वोटों का ध्रुवीकरण और जीत का मार्जिन लगातार बदलता रहा।
2012 का चुनाव: सपा प्रत्याशी श्याम प्रकाश को 67,430 वोट मिले, जबकि उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी बसपा की अनीता वर्मा को 61,227 वोट प्राप्त हुए। जीत का अंतर महज 6,203 वोटों का था। उस समय मुकाबले में मतों का स्पष्ट बंटवारा था और कांग्रेस के सर्वेश कुमार भी 31,388 वोट हासिल करने में सफल रहे थे।
2017 का चुनाव: राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदली। भाजपा के टिकट पर उतरे श्याम प्रकाश को 87,871 वोट मिले, जबकि सपा की राजेश्वरी को 56,493 और बसपा की मीना कुमारी को 49,847 वोट मिले। भाजपा की लहर में जीत का अंतर बढ़कर 31,378 वोट हो गया।

2022 का चुनाव: श्याम प्रकाश के वोट बढ़कर 91,762 हो गए, लेकिन सपा की राजेश्वरी ने भी अपना जनाधार मजबूत करते हुए 83,764 वोट हासिल किए। नतीजा यह रहा कि श्याम प्रकाश की जीत तो बरकरार रही, लेकिन जीत का अंतर घटकर मात्र 7,998 वोट रह गया।
यहीं से 2027 का पहला सवाल उठता है—वोट बढ़ने के बावजूद जीत का अंतर क्यों घटा? आंकड़े बताते हैं कि विजेता का व्यक्तिगत आधार तो कायम रहा, लेकिन विपक्ष के मतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।

2. विधानसभा vs लोकसभा: जब आम चुनाव आता है तो क्यों बदल जाता है मिज़ाज?

गोपामऊ विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं का मिजाज विधानसभा चुनावों से काफी भिन्न रहा है:
2019 लोकसभा चुनाव: इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने सपा पर 7,474 वोटों की बढ़त बनाई थी।2024 लोकसभा चुनाव: तस्वीर पूरी तरह उलट गई और सपा ने पासा पलटते हुए भाजपा पर 2,684 वोटों की बढ़त हासिलकर ली।
अर्थात, एक तरफ जहां विधानसभा चुनाव में श्याम प्रकाश लगातार तीन बार जीते, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में गोपामऊ का दलगत रुझान लगातार बदलता रहा। यही विरोधाभास 2027 के राजनीतिक गणित को दिलचस्प बनाता है।

3. SIR-2026 की मार: 36,910 वोट गायब, अब किस दल का बिगड़ेगा गणित?

2027 के चुनाव से ठीक पहले गोपामऊ के चुनावी गणित में एक बड़ा बदलाव मतदाता सूची के स्तर पर हुआ है। विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) से पहले इस क्षेत्र में कुल 3,55,422 मतदाता थे। SIR-2026 की अंतिम सूची जारी होने के बाद यह संख्या घटकर 3,18,512 रह गई है।इस प्रकार मतदाता सूची में 36,910 मतदाताओं (लगभग 10.39%) की शुद्ध कमी दर्ज की गई है।
नए मतदाता आंकड़े:
पुरुष मतदाता: 1,74,599
महिला मतदाता: 1,43,906
थर्ड जेंडर मतदाता: 7
इसके अलावा, प्रशासन ने गोपामऊ के लिए ‘नो-मैपिंग’ और तार्किक विसंगतियों से संबंधित सूची भी जारी की है। यह बदलाव 2027 के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब पुरानेवायदों बूथवार वोट प्रतिशत को सीधे नए चुनावी गणित पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन घटे हुए 36,910 वोटों का नुकसान किस दल, जाति या वर्ग को होगा, यह अभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता।

4. 2027 की असली चुनौती: क्या व्यक्ति की हैट्रिक पर भारी पड़ेगा बदलता समीकरण?

गोपामऊ की सियासत को सिर्फ “दल बनाम व्यक्ति” के चश्मे से देखना अधूरा होगा। श्याम प्रकाश की लगातार तीन जीत एक बड़ा राजनीतिक तथ्य है, लेकिन जीत का अंतर 6,203 से बढ़कर 31,378 होना और फिर घटकर 7,998 पर आ जाना, बदलते जनादेश की ओर इशारा करता है।
इसके अलावा:
2022 में सपा का 83,764 वोटों तक पहुंचना और 2024 के लोकसभा चुनाव में इस खंड में आगे निकलना सपा के मजबूत होते आधार को दर्शाता है।
2022 में बसपा को मिले 31,715 वोट यह साबित करते हैं कि मुकाबला केवल दो-पक्षीय नहीं है।अब SIR के बाद बने 3.18 लाख के नए मतदाता आधार, पिछले चुनावों के उतार-चढ़ाव और 2027 में मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों के आधार पर ही गोपामऊ की अगली सियासी तस्वीर तय होगी।
गोपामऊ में पिछले तीन विधानसभा चुनावों ने भले ही चेहरा एक रखा हो, लेकिन वोटों की धारा को कभी स्थिर नहीं रहने दिया। 2027 की लड़ाई सिर्फ जीत की निरंतरता बनाए रखने की नहीं, बल्कि बदलते जनादेश, नए मतदाता आधार और करवट लेते राजनीतिक समीकरणों के बीच खुद को साबित करने की होगी।

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