लेह, 15 सितंबर (वेब वार्ता)। जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों में घटते जलस्रोतों के बीच लद्दाख प्रशासन ने करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित त्सो कार झील को पुनर्जीवित करने की महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है। इस परियोजना के तहत 18 हजार फीट से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र से हिमानी जल को प्राकृतिक प्रवाह के माध्यम से त्सो कार तक पहुंचाया जाएगा। प्रशासन का लक्ष्य अक्टूबर 2027 तक झील को उसके पुराने स्वरूप के करीब लाना है।
लद्दाख के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने इस पहल को उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनके अनुसार, हिमानी जल को झील तक पहुंचाने की यह पहल भारत में इतनी अधिक ऊंचाई पर किसी संकटग्रस्त झील के पुनर्जीवन का अपनी तरह का पहला प्रयास है।
पिछले दशक में 70 प्रतिशत तक सिकुड़ी झील
त्सो कार झील कभी करीब 11 हजार एकड़ क्षेत्र में फैली हुई थी। हालांकि, पिछले एक दशक में इसके जल क्षेत्र में भारी कमी आई है और अब इसका क्षेत्रफल लगभग 3,200 एकड़ रह गया है। झील के लगातार सिकुड़ने का असर केवल जलस्रोत पर ही नहीं पड़ा, बल्कि पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगा है।
झील के सिकुड़ने के कारण प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी कमी आई है। इनमें दुर्लभ काली गर्दन वाली सारस प्रमुख है। जल और आर्द्रभूमि क्षेत्र घटने से इन पक्षियों के लिए उपयुक्त आवास भी कम हुए हैं।
हिमानी जल को झील तक पहुंचाने की योजना
परियोजना के तहत 18 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित रूपशो खर्नक धारा के हिमानी जल को प्राकृतिक ढाल और गुरुत्वाकर्षण के सहारे त्सो कार की दिशा में मोड़ा जा रहा है। इसके लिए करीब 11.5 किलोमीटर लंबी मिट्टी की नहर तैयार की जा रही है।
योजना के अनुसार लगभग 320 करोड़ लीटर जल को झील क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा। जल को सीधे मुख्य झील में डालने के बजाय रास्ते में मौजूद तीन प्राकृतिक गड्ढों और जलग्रहण क्षेत्रों में रोका जाएगा। इनका क्षेत्रफल क्रमशः करीब 270, 24 और 10 एकड़ है।
इन तीनों प्राकृतिक जलाशयों में कुल मिलाकर लगभग 123 करोड़ लीटर पानी संग्रहित होने की क्षमता बताई गई है। इनके भरने के बाद अतिरिक्त पानी धीरे-धीरे मुख्य त्सो कार झील तक पहुंचेगा।
चार दिन में भरा झील के पुराने जल का 20 प्रतिशत
प्रशासन के अनुसार, 9 सितंबर से करीब 20 घन फीट प्रति सेकंड की दर से पानी को पहले प्राकृतिक जलाशय की ओर मोड़ा गया है। शुरुआती चरण में ही जलाशय तेजी से भरने लगा और चार दिनों के भीतर इसमें त्सो कार के पूर्व जल आयतन का लगभग 20 प्रतिशत पानी पहुंच गया।
अधिकारियों को उम्मीद है कि तीनों जलाशयों के भरने और उनके अतिरिक्त जल के प्रवाह के बाद अक्टूबर के पहले सप्ताह तक पानी मुख्य झील तक पहुंचना शुरू हो जाएगा।
तीन नए मीठे पानी के आर्द्र क्षेत्र बनने की उम्मीद
इस परियोजना की खासियत केवल त्सो कार को पानी उपलब्ध कराना नहीं है। जल को क्रमिक रूप से तीन प्राकृतिक जलाशयों से गुजारने की व्यवस्था की गई है। इससे वहां तीन नए मीठे पानी वाले आर्द्र क्षेत्र विकसित होने की संभावना है।
इन जलाशयों में पानी ठहरने से जल के साथ आने वाली मिट्टी और अन्य अवसाद नीचे बैठ जाएंगे। इससे मुख्य झील में अपेक्षाकृत साफ पानी पहुंचाने में मदद मिलेगी। साथ ही, नए आर्द्र क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए नए आश्रय स्थल के रूप में विकसित हो सकते हैं।
लेह-मनाली मार्ग के समीप बनने वाले इन जलाशयों से भविष्य में क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की संभावना जताई जा रही है।
पश्मीना चरवाहों को मिलेगा सीधा लाभ
त्सो कार का पुनर्जीवन स्थानीय समुदायों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। झील के आसपास रहने वाले अनेक ग्रामीण पश्मीना बकरियों के पालन पर निर्भर हैं। जलस्रोत और चरागाहों के सिकुड़ने के कारण उन्हें अपनी बकरियों के लिए नए चरागाह खोजने पड़ रहे हैं।
स्थानीय पश्मीना चरवाहों को कई बार अपने गांवों से 50 से 75 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। झील और उससे जुड़े घास के मैदानों के पुनर्जीवित होने से चरागाहों की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है। इससे चरवाहों को अपने पारंपरिक क्षेत्रों के आसपास ही पशुपालन जारी रखने में मदद मिल सकती है।
बिना बड़ी पूंजीगत लागत के काम
प्रशासन के अनुसार, परियोजना में बड़े निर्माण कार्य या भारी पूंजीगत निवेश के बजाय प्राकृतिक ढाल, जल के गुरुत्वीय प्रवाह और साधारण मिट्टी के कार्यों का उपयोग किया जा रहा है। फिलहाल निर्माण और जल मार्ग तैयार करने के लिए जेसीबी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
लद्दाख प्रशासन इसे कम लागत वाला और टिकाऊ जल प्रबंधन मॉडल मान रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इससे यह भी साबित होता है कि अत्यधिक ठंडे और ऊंचाई वाले रेगिस्तानी क्षेत्रों में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों का उपयोग करके जल संरक्षण के प्रभावी उपाय किए जा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में महत्वपूर्ण प्रयोग
हिमालयी क्षेत्र में तापमान और वर्षा के बदलते स्वरूप का असर जलस्रोतों पर लगातार दिखाई दे रहा है। ऐसे में त्सो कार का पुनर्जीवन केवल एक झील को बचाने की परियोजना नहीं, बल्कि उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका को एक साथ मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है।
लद्दाख प्रशासन को उम्मीद है कि अक्टूबर 2027 तक त्सो कार में पर्याप्त जल संचय होने के साथ आसपास के आर्द्र क्षेत्रों और चरागाहों को भी नया जीवन मिलेगा। यदि यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम देता है, तो अत्यधिक ऊंचाई वाले अन्य संकटग्रस्त जलस्रोतों के संरक्षण के लिए भी यह एक उपयोगी मॉडल बन सकता है।




