कोलकाता, 15 जून (वेब वार्ता)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कभी संसद के दोनों सदनों में लगभग 40 सांसदों के साथ मजबूत विपक्षी ताकत मानी जाने वाली पार्टी अब गंभीर राजनीतिक संकट से जूझती दिखाई दे रही है। बागी नेताओं के दावे, नेतृत्व पर उठते सवाल और दल बदल की अटकलों ने पार्टी की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से ही कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के कामकाज पर नाराजगी जाहिर की है। कुछ सांसदों ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई है, जबकि कई नेता खुलकर संगठन में बदलाव की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या तृणमूल कांग्रेस भी अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह बड़े विभाजन की ओर बढ़ रही है।
सौगत रॉय ने बगावत को बताया अनैतिक
वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ जाने की चर्चाओं को अनैतिक करार दिया है। उन्होंने कहा कि चुनावी हार के बाद नेताओं की बदलती निष्ठा चिंताजनक है और पार्टी की एकता बनाए रखना समय की आवश्यकता है। उन्होंने अभिषेक बनर्जी को पार्टी की मौजूदा स्थिति के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराने से भी इनकार किया और इसे अवसरवाद की राजनीति बताया।
लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की तैयारी
बागी खेमे से जुड़े सांसद जगदीश बसुनिया ने दावा किया है कि उनका समूह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अपने धड़े को “असली तृणमूल कांग्रेस” के रूप में मान्यता देने की मांग करेगा। यदि ऐसा होता है तो यह पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन का बड़ा कदम माना जाएगा।
ममता और अभिषेक पर लगाए गंभीर आरोप
जगदीश बसुनिया ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि संगठन में संवाद की संस्कृति समाप्त हो चुकी है। उनके अनुसार, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनी जाती। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और अन्य शीर्ष नेता संगठन के भीतर असहमति को महत्व नहीं देते, जिससे संकट और गहराता जा रहा है।
एनडीए के समर्थन को विकास से जोड़ा
बागी नेताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने निर्वाचन क्षेत्रों का विकास सुनिश्चित करना है। बसुनिया ने कहा कि विकास के लिए राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय आवश्यक है। ऐसे में यदि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ खड़े होने से क्षेत्र को लाभ मिलता है, तो वह इस दिशा में आगे बढ़ने को तैयार हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा ने दोहराई निष्ठा
इन तमाम अटकलों के बीच तृणमूल सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने कहा कि उनकी किसी अन्य राजनीतिक दल या गठबंधन में जाने की कोई मंशा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग लालच, भय या दबाव में निर्णय ले सकते हैं, लेकिन वह व्यक्तिगत टिप्पणी करने से बचना चाहते हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, “मेरा केवल एक ही नेता है और वह ममता बनर्जी हैं। मैं पहले भी उनके साथ था और आगे भी उनके साथ रहूंगा।”
बागी गुट का दावा- 20 सांसदों का समर्थन
बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने दावा किया है कि लगभग 20 सांसद उनके गुट के साथ हैं। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी को नए स्वरूप में खड़ा करना है और संसद में अलग पहचान बनाकर काम करना है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी का समर्थन उनके गुट को प्राप्त है।
हालांकि, तृणमूल सांसद डोला सेन ने बागी सांसदों की संख्या और उनके दावों पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
बागी नेताओं पर सत्ता की लालसा का आरोप
ममता बनर्जी खेमे से जुड़े वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने बागी नेताओं पर सत्ता के लालच में पार्टी छोड़ने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के कारण कुछ नेता राजनीतिक लाभ की उम्मीद में पाला बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
कई नेताओं ने पहले ही छोड़ा साथ
पार्टी संकट के बीच कई प्रमुख नेताओं ने तृणमूल से दूरी बना ली है। हाल ही में प्रकाश चिक बराइक और कोयल मल्लिक ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव भी पार्टी छोड़ चुके हैं। सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए थे, जबकि सुष्मिता देव ने अपने गृह राज्य की राजनीति पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही थी।
क्या टीएमसी के सामने अस्तित्व का संकट?
तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी यह घमासान अब केवल असंतोष तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि संगठनात्मक चुनौती का रूप ले चुका है। यदि बागी नेताओं के दावे सही साबित होते हैं और सांसदों का एक बड़ा वर्ग अलग राह चुनता है, तो पार्टी को संसद और राज्य की राजनीति दोनों में बड़ा झटका लग सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी इस संकट से पार्टी को उबारने में कितनी सफल होती हैं और क्या टीएमसी अपनी एकजुटता बचा पाएगी।




