बीजिंग, 08 मई (वेब वार्ता)। चीन की सैन्य अदालत ने भ्रष्टाचार के गंभीर मामले में देश के दो पूर्व रक्षा मंत्रियों ली शांगफू और वेई फेंगहे को मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों को दो वर्ष की मोहलत भी प्रदान की है। निर्धारित अवधि के दौरान यदि दोनों किसी नए अपराध में शामिल नहीं पाए जाते हैं तो उनकी सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने बताया कि अदालत ने वेई फेंगहे को रिश्वत लेने का दोषी माना है। वहीं ली शांगफू को रिश्वत लेने और देने दोनों मामलों में दोषी ठहराया गया। चीन में इस प्रकार की निलंबित मौत की सजा को बाद में आजीवन कारावास में बदलने की परंपरा रही है।
यह फैसला चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत सामने आया है। शी जिनपिंग ने एक दशक पहले उच्च अधिकारियों और सैन्य नेतृत्व में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरू किया था। हाल के वर्षों में इस अभियान के तहत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और शीर्ष नेताओं को पद से हटाया गया है।
जनवरी में भी चीन के सर्वोच्च सैन्य नेतृत्व में बड़े बदलाव देखने को मिले थे। चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग में पहले 11 सदस्य शामिल थे, लेकिन अब शी जिनपिंग के अलावा केवल एक सदस्य ही बचा है। इसे चीन की सत्ता और सेना पर नियंत्रण मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के जरिए शी जिनपिंग राजनीतिक निष्ठा को मजबूत करने और सत्ता पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ली शांगफू या वेई फेंगहे के शी जिनपिंग के साथ किसी प्रकार के राजनीतिक मतभेद थे या नहीं।
वेई फेंगहे ने वर्ष 2018 से 2023 तक चीन के रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया था। उनके बाद ली शांगफू को यह जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन कुछ ही महीनों बाद वे सार्वजनिक जीवन से अचानक गायब हो गए। बाद में अक्टूबर 2023 में उन्हें पद से हटा दिया गया।
ली शांगफू ने अपने सैन्य करियर का बड़ा हिस्सा चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की मिसाइल और रक्षा खरीद शाखाओं में बिताया। रूसी सैन्य उपकरणों की खरीद से जुड़े मामलों के कारण अमेरिका ने उन पर यात्रा और वित्तीय प्रतिबंध भी लगाए थे।
ली शांगफू के बाद नियुक्त डोंग जून अभी चीन के रक्षा मंत्री हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें सेना की निगरानी करने वाले शक्तिशाली केंद्रीय सैन्य आयोग में शामिल नहीं किया गया है, जिससे उनकी राजनीतिक और सैन्य शक्ति सीमित मानी जा रही है।




