-कांतिलाल मांडोत- 
कई दिनों के धरना-प्रदर्शन के बाद आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पहली नजर में इसे आंदोलन की बड़ी जीत और लोकतंत्र की सफलता के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न वही है, जो हर छात्र और अभिभावक के मन में है—क्या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से छात्रों का भविष्य सुरक्षित हो गया? क्या इससे पेपर लीक की समस्या समाप्त हो जाएगी? क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता लौट आएगी? क्या लाखों विद्यार्थियों की मेहनत अब बिना किसी भय के रंग लाएगी? इन सभी सवालों का उत्तर फिलहाल नकारात्मक दिखाई देता है। यही कारण है कि आंदोलन की सफलता का मूल्यांकन केवल एक मंत्री के इस्तीफे से नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था में आने वाले वास्तविक सुधारों से किया जाना चाहिए।
सबसे पहले उस बात का उल्लेख आवश्यक है जो इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दीपके ने मंच से कहा कि “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।” उन्होंने इसे अपनी और लोकतंत्र की जीत बताया। निस्संदेह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज सुनना सरकार की जिम्मेदारी होती है और यदि सरकार ने छात्रों के दबाव के बाद निर्णय लिया है तो यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत माना जा सकता है। लेकिन यहां यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि दीपके की राजनीतिक या आंदोलनकारी जीत अपनी जगह हो सकती है, परंतु उस छात्र को इससे क्या मिला जिसकी एक वर्ष की मेहनत पेपर लीक के कारण बर्बाद हो गई? जो विद्यार्थी मानसिक तनाव में आ गया, जिसने दोबारा परीक्षा दी, जिसने आर्थिक और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना किया, उसके जीवन में अभी तक कोई ठोस परिवर्तन दिखाई नहीं देता। इसलिए केवल सुर्खियों में आने या आंदोलन की सफलता का दावा करने से छात्रों की वास्तविक समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं।
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे के बाद जारी पत्र में कहा कि उन्होंने पहले दिन से ही नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की थी और उनका उद्देश्य किसी भी मेधावी छात्र का भविष्य परीक्षा माफिया के कारण खराब नहीं होने देना था। उन्होंने यह भी कहा कि देश की युवा शक्ति उनके लिए सर्वोपरि है और राष्ट्रहित तथा छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पद छोड़ा। यह एक जिम्मेदार राजनीतिक संदेश है। इसी तरह सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, मुकदमे वापस लेने की बात कही, पीड़ित छात्रों के लिए मुआवजे की घोषणा की और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर चर्चा का भरोसा दिया। हिंसा और तनाव के बावजूद सरकार ने अंततः संवाद का रास्ता चुना। यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की संवेदनशीलता का परिचायक माना जा सकता है।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि किसी मंत्री का इस्तीफा स्वयं में समाधान नहीं होता। पेपर लीक जैसी घटनाएं किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं बल्कि पूरे तंत्र की कमजोरी का परिणाम होती हैं। यदि व्यवस्था में खामियां बनी रहेंगी तो नया मंत्री भी उन्हीं चुनौतियों का सामना करेगा। छात्रों को मंत्री बदलने से नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने से लाभ मिलेगा।
आज देश के करोड़ों विद्यार्थी एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं कि क्या अब पेपर लीक पूरी तरह बंद हो जाएगा? दुर्भाग्य से इसका उत्तर इतना आसान नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षा केंद्रों पर अनियमितताओं और संगठित नकल गिरोहों के सक्रिय होने की घटनाएं सामने आई हैं। इसका अर्थ है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संगठित अपराध का रूप ले चुका है। ऐसे नेटवर्क में छोटे-छोटे एजेंटों से लेकर आर्थिक लाभ उठाने वाले बड़े मास्टरमाइंड तक शामिल होते हैं। कार्रवाई अक्सर निचले स्तर तक सीमित रह जाती है जबकि पूरे षड्यंत्र को संचालित करने वाले लोग बच निकलते हैं। जब तक इन मास्टरमाइंड तक कानून की पहुंच नहीं होगी, तब तक छात्रों का विश्वास पूरी तरह बहाल नहीं हो सकता।
सरकार ने पेपर लीक से जुड़े अपराधों के लिए दस वर्ष तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया है। यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है। कठोर कानून अपराधियों के मन में भय पैदा कर सकते हैं। लेकिन केवल कानून बना देने से न्याय नहीं मिलता। न्याय तब मिलता है जब अपराध की निष्पक्ष जांच हो, असली दोषियों की पहचान हो और समयबद्ध तरीके से उन्हें सजा मिले। यदि जांच केवल छोटे आरोपियों तक सीमित रह गई तो कठोर कानून भी अपनी प्रभावशीलता खो देंगे।
यही कारण है कि जांच एजेंसियों को केवल गिरफ्तारियां करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि पूरे नेटवर्क की आर्थिक, डिजिटल और तकनीकी जांच करनी चाहिए। जिन लोगों पर गंभीर आरोप हों, उनके बैंक खातों, संपत्तियों, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल लेन-देन और आपराधिक नेटवर्क की गहन पड़ताल होनी चाहिए। वैज्ञानिक जांच की उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग भी आवश्यक परिस्थितियों में किया जा सकता है, ताकि वास्तविक साजिशकर्ताओं तक पहुंचना संभव हो। उद्देश्य केवल गिरफ्तारियां दिखाना नहीं बल्कि पूरे माफिया तंत्र को समाप्त करना होना चाहिए।
इस पूरे विवाद में कोचिंग संस्थानों की भूमिका पर भी गंभीर चर्चा आवश्यक है। यह सत्य है कि देश के अधिकांश कोचिंग संस्थान ईमानदारी से छात्रों को शिक्षा देते हैं, लेकिन यदि कोई संस्था पेपर लीक या परीक्षा माफिया से जुड़ी पाई जाती है तो उसके खिलाफ केवल मुकदमा दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी मान्यता समाप्त की जानी चाहिए, उसकी वित्तीय गतिविधियों की जांच होनी चाहिए और यदि अपराध सिद्ध हो तो उसे शिक्षा क्षेत्र से स्थायी रूप से बाहर किया जाना चाहिए। शिक्षा विश्वास का क्षेत्र है, इसे अवैध कमाई का माध्यम बनाने वालों के प्रति कठोरता आवश्यक है।
कई लोग ऐसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या यूएपीए जैसे कठोर कानून लागू करने की मांग भी कर रहे हैं। इन कानूनों का प्रयोग अपने-अपने कानूनी दायरे में ही किया जा सकता है और उनका उपयोग तथ्यों तथा कानून के अनुरूप ही होना चाहिए। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि कोई संगठित गिरोह करोड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है तो उसके विरुद्ध उपलब्ध सभी प्रभावी कानूनी प्रावधानों का कठोरता से उपयोग होना चाहिए। परीक्षा माफिया को सामान्य आर्थिक अपराधी मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।
फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्णय भी महत्वपूर्ण है। इससे मुकदमों के शीघ्र निपटारे की संभावना बढ़ेगी। लेकिन यदि जांच कमजोर होगी तो फास्ट ट्रैक कोर्ट भी सीमित साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला देगा। इसलिए तेज अदालतों के साथ मजबूत जांच व्यवस्था और आधुनिक फोरेंसिक तंत्र भी उतना ही आवश्यक है। न्याय केवल जल्दी नहीं बल्कि सही भी होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच छात्रों के मन में एक और उम्मीद है कि क्या भविष्य में वर्ष में दो बार नीट परीक्षा आयोजित होगी। यदि ऐसा होता है तो एक परीक्षा खराब होने पर विद्यार्थियों का पूरा वर्ष बर्बाद नहीं होगा। यह सुधार निश्चित रूप से छात्रों के हित में माना जा सकता है। लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि परीक्षा पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी हो। यदि वर्ष में दो बार परीक्षा होगी लेकिन दोनों बार पेपर लीक का खतरा रहेगा तो इसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
आज आवश्यकता शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की है। प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया, सुरक्षित मुद्रण, डिजिटल एन्क्रिप्शन, परिवहन व्यवस्था, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुरक्षा प्रणाली, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया—इन सभी क्षेत्रों में एक साथ सुधार करना होगा। केवल मंत्री बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था बदलने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता और तकनीकी दक्षता तीनों की आवश्यकता होती है।
इस पूरे आंदोलन से सरकार को भी एक महत्वपूर्ण संदेश मिला है कि आज का युवा केवल आश्वासन नहीं बल्कि परिणाम चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी कहा कि आज की पीढ़ी हर बात का कारण जानना चाहती है और सरकार को युवाओं से संवाद करना चाहिए। यह सलाह केवल सरकार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए भी प्रासंगिक है। विद्यार्थियों का विश्वास तभी लौटेगा जब उन्हें लगेगा कि उनकी मेहनत किसी माफिया या भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मान लेना भूल होगी। छात्रों की वास्तविक जीत उस दिन होगी जब किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक नहीं होगा, किसी अभ्यर्थी को दोबारा परीक्षा देने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा, किसी परिवार का सपना भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ेगा और किसी विद्यार्थी को यह डर नहीं रहेगा कि उसकी मेहनत से अधिक कीमत किसी माफिया की पहुंच की है। इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति के परिवर्तन की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की है। तभी कहा जा सकेगा कि इस संघर्ष का सबसे बड़ा विजेता कोई नेता या आंदोलनकारी नहीं, बल्कि देश का मेहनती विद्यार्थी बना।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार है)




