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बदलते समाज की देहरी पर ठिठकता वृद्ध जीवन

बरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक का सामाजिक चिंतन

काल-चक्र का घूमता पहिया मनुष्य को निरंतर प्रगति, नवीनता और आधुनिकता के क्षितिज की ओर ले जा रहा है। विज्ञान ने दूरियां मिटा दी हैं, तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बना दिया है और बदलती जीवनशैली ने समाज की संरचना को भी नया रूप दिया है। लेकिन इस विकास यात्रा का एक दारुण पक्ष भी है—जिस समाज की नींव हमारे वयोवृद्धों के पसीने, त्याग, संघर्ष और अनुभवों से सींची गई, वही समाज आज अपनी जड़ों से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है।
भारतीय संस्कृति में वृद्धजन कभी परिवार के शीर्ष माने जाते थे। वे केवल उम्रदराज सदस्य नहीं, बल्कि परिवार की स्मृति, परंपरा, संस्कार और अनुभवों के जीवंत भंडार होते थे। उनकी उपस्थिति घर को केवल आश्रय नहीं देती थी, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने का काम भी करती थी। आज बदलते सामाजिक ताने-बाने में वही वृद्धजन कई बार एकाकीपन, उपेक्षा और अस्तित्व के संकट से जूझते दिखाई देते हैं।
अतीत की गरिमा से वर्तमान की उपेक्षा तक
भारतीय जीवन-दर्शन में ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन का मूल संस्कार था। संयुक्त परिवारों में दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के लिए कहानी, संस्कार और जीवन-अनुभवों की पाठशाला हुआ करते थे।
लेकिन तीव्र नगरीकरण, रोजगार की बदलती परिस्थितियों और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने परिवार की पारंपरिक संरचना को बदल दिया है। पहले जिस बुजुर्ग की सलाह पर पूरे परिवार के निर्णय लिए जाते थे, आज उसी की बात कई बार ‘पुराने विचार’ कहकर किनारे कर दी जाती है।
यह बदलाव केवल परिवार की संरचना में नहीं आया है, बल्कि रिश्तों की संवेदनशीलता में भी दिखाई देता है।
एक ही छत के नीचे बढ़ता एकाकीपन
आज युवा पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में महानगरों और विदेशों तक जा रही है। यह समय की आवश्यकता भी है और विकास का हिस्सा भी। समस्या तब पैदा होती है, जब भौतिक दूरी के साथ भावनात्मक दूरी भी बढ़ जाती है।
विडंबना यह है कि स्मार्टफोन और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया है, लेकिन कई घरों में बुजुर्ग अपने ही परिवार के बीच संवाद के लिए तरस जाते हैं। घर में मौजूद होकर भी वे अपनेपन की तलाश करते हैं।
उनके लिए दो पल बैठकर बात कर लेना, पुरानी यादें सुन लेना या उनकी किसी छोटी-सी चिंता को गंभीरता से सुन लेना शायद बहुत बड़ी बात न हो, लेकिन यही छोटे-छोटे क्षण उनके जीवन में अपनत्व और सुरक्षा का भाव पैदा करते हैं।
निर्भरता से बढ़ती पीड़ा
बुढ़ापा जीवन का वह पड़ाव है, जहां शरीर की गति धीमी पड़ने लगती है और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। जिन बुजुर्गों के पास पर्याप्त आर्थिक साधन या नियमित पेंशन नहीं होती, उनके लिए इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें भी चुनौती बन जाती हैं।
आर्थिक निर्भरता कई बार स्वाभिमान को भीतर तक चोट पहुंचाती है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार को खड़ा करने में लगा दिया, उसी को जीवन की संध्या में छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए दूसरों की ओर देखना पड़े, तो यह स्थिति केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।
समाधान रिश्तों से शुरू होगा
वृद्धजनों की समस्या का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं हो सकता। इसकी शुरुआत परिवार से करनी होगी।
बुजुर्गों के साथ प्रतिदिन कुछ समय बिताना, उनकी बात ध्यान से सुनना, परिवार के निर्णयों में उनकी राय लेना और उन्हें यह एहसास कराना कि वे परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार की धरोहर हैं—ये छोटे कदम बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
नई पीढ़ी को यह समझाना भी जरूरी है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं है। विकास और संस्कार साथ-साथ चल सकते हैं।
इसके साथ ही वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, सम्मानजनक वृद्धावस्था पेंशन, प्रभावी सहायता तंत्र, हेल्पलाइन सेवाओं और सामुदायिक गतिविधियों को मजबूत किया जाना चाहिए। ऐसे सामुदायिक मंच विकसित किए जाने चाहिए, जहां बुजुर्ग केवल सहायता पाने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने अनुभव साझा करने वाले सक्रिय सदस्य बन सकें।
बुजुर्गों का अनुभव समाज की पूंजी है
वृद्धजन केवल अतीत के प्रतिनिधि नहीं हैं। वे अनुभव की ऐसी धरोहर हैं, जिसका उपयोग वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने में किया जा सकता है।
उन्होंने जीवन के उतार-चढ़ाव देखे हैं, संघर्षों का सामना किया है और बदलते समय को अपनी आंखों के सामने गुजरते देखा है। उनके अनुभव परिवारों, सामाजिक संस्थाओं और व्यापक नीति-निर्माण के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
बच्चों के जीवन में दादा-दादी या नाना-नानी की उपस्थिति उन्हें धैर्य, संवेदना, अनुशासन और रिश्तों की अहमियत सिखा सकती है। इस तरह बुजुर्गों का सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और हमारी सामाजिक स्मृति का सम्मान है।
हमें तय करना होगा कि कैसी होगी हमारी अगली पीढ़ी
वृद्धजन समाज का बीता हुआ कल भर नहीं हैं। वे वह पुल हैं, जो अतीत को वर्तमान से और वर्तमान को भविष्य से जोड़ते हैं।
एक विकसित राष्ट्र वही नहीं होता, जहां ऊंची इमारतें, तेज इंटरनेट और आधुनिक सुविधाएं हों। वास्तविक विकास वहां है, जहां आधुनिकता के साथ संवेदनशीलता भी जीवित रहे; जहां नई पीढ़ी को पंख देने के साथ बुजुर्गों को जड़ें भी उपलब्ध हों।
आज यदि हम वृद्धावस्था के ढलते सूरज को सम्मान, सुरक्षा और अपनत्व का उजाला नहीं दे पाए, तो काल का चक्र हमें भी एक दिन उसी देहरी पर लाकर खड़ा करेगा।
तब सवाल यह नहीं होगा कि समाज कितना आधुनिक हुआ, बल्कि यह होगा कि आधुनिक होते हुए उसने इंसानियत को कितना बचाए रखा।

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