28 जुलाई चातुर्मास: आत्म विकास का अपूर्व अवसर चातुर्मास

-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot

भारतीय संस्कृति में समय को केवल दिनों और महीनों की गणना नहीं माना गया बल्कि जीवन को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। प्रत्येक कार्य का अपना एक उपयुक्त समय होता है। जब कार्य समय के अनुरूप किया जाता है तब उसका परिणाम भी श्रेष्ठ होता है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों और आचार्यों ने जीवन को ऋतु और काल के साथ जोड़कर साधना की परंपराएं विकसित कीं। चातुर्मास ऐसी ही एक अनुपम परंपरा है जो मनुष्य को बाहरी दौड़ से हटाकर अपने भीतर लौटने का अवसर देती है। यह केवल चार महीनों का धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आत्मविकास आत्मसंयम और जीवन के पुनर्निर्माण का काल है।
योगवशिष्ठ में कहा गया है कि महापुरुष कभी भी समय की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। वे जानते हैं कि प्रत्येक कार्य की सफलता में काल का अत्यंत महत्त्व है। किसान यदि समय पर बीज न बोए तो उपज नहीं मिलती। इसी प्रकार मनुष्य यदि उचित समय पर आत्मचिंतन और साधना न करे तो जीवन की उर्वरता भी धीरे धीरे समाप्त होने लगती है। चातुर्मास इसी उचित समय का नाम है।
यदि इस सत्य को एक अलग दृष्टांत से समझें तो कल्पना कीजिए कि कोई कुशल मूर्तिकार वर्षों तक एक विशाल प्रतिमा गढ़ता है। वह हर दिन छैनी नहीं चलाता। कुछ समय ऐसा भी आता है जब वह केवल दूर खड़ा होकर प्रतिमा को देखता है। वह यह परखता है कि अगली चोट कहां करनी है ताकि पूरी आकृति बिगड़े नहीं। यदि वह बिना रुके केवल प्रहार करता रहे तो उत्कृष्ट मूर्ति भी नष्ट हो सकती है। मनुष्य का जीवन भी ऐसी ही एक मूर्ति है। चातुर्मास वह समय है जब जीवन पर लगातार प्रहार करने के बजाय रुककर स्वयं को देखने की आवश्यकता होती है। यही ठहराव आगे की श्रेष्ठ यात्रा का आधार बनता है।
वर्षा ऋतु में प्रकृति का पूरा स्वरूप बदल जाता है। धरती को नया जीवन मिलता है। सूखे बीज अंकुरित हो जाते हैं। वातावरण में नमी बढ़ जाती है और असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है। जैन परंपरा ने इस प्राकृतिक परिवर्तन को केवल मौसम का बदलाव नहीं माना बल्कि करुणा और अहिंसा के अभ्यास का अवसर बनाया। इसी कारण भगवान महावीर के शासन में साधु साध्वियों के लिए वर्षावास का विधान किया गया ताकि वे अनावश्यक विहार से बचें और सूक्ष्म जीवों की हिंसा न्यूनतम हो।
चातुर्मास का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन की गति जितनी आवश्यक है उतना ही आवश्यक है उसका विराम। आज का मनुष्य निरंतर भाग रहा है। उसके पास उपलब्धियां हैं लेकिन आत्मसंवाद का समय नहीं है। चातुर्मास इस भागदौड़ के बीच यह स्मरण कराता है कि बाहरी यात्रा तभी सार्थक है जब भीतर का पथ भी प्रकाशित हो।
भारतीय परंपरा में चातुर्मास केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं रहा। वैदिक और बौद्ध परंपराओं में भी इन चार महीनों को साधना तप और आत्मानुशासन का श्रेष्ठ समय माना गया। देवशयन का प्रतीक भी इसी भावना को व्यक्त करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान वास्तव में सो जाते हैं बल्कि यह संकेत है कि मनुष्य अपनी बाहरी प्रवृत्तियों को सीमित करे और अंतर्मुखी बने। जब संसार की चकाचौंध थोड़ी मंद होती है तभी आत्मा का प्रकाश अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
भगवान महावीर और जयन्ती श्राविका के संवाद में भी यही गूढ़ संदेश मिलता है। जब जयन्ती ने पूछा कि सोना अच्छा है या जागना तो भगवान ने उत्तर दिया कि हिंसा और पाप में लगे लोगों का सोना अच्छा है और दया संयम तथा सदाचार में लगे लोगों का जागना श्रेष्ठ है। यह उत्तर केवल शब्दों का कौशल नहीं बल्कि जीवन का दर्शन है। चातुर्मास हमें यही सिखाता है कि हमारे भीतर का क्रोध लोभ कपट और प्रमाद सो जाए तथा करुणा विवेक और संयम जाग उठें।
इन चार महीनों का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। वर्षा ऋतु में जल दूषित होता है। संक्रमण फैलते हैं। भोजन जल्दी खराब होता है और शरीर की पाचन शक्ति भी कमजोर पड़ जाती है। इसलिए संयमित भोजन उपवास एकासन आयंबिल और रात्रि भोजन का त्याग केवल धार्मिक नियम नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी हैं। हमारे प्राचीन आचार्यों ने धर्म और आरोग्य दोनों को साथ लेकर नियम बनाए थे। यही उनकी दूरदृष्टि थी।
चातुर्मास का एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है व्रत और नियम। आज अनेक लोग नियम लेने से इसलिए डरते हैं कि कहीं उसका पालन न कर सके तो दोष लगेगा। जबकि वास्तव में नियम मनुष्य की संकल्पशक्ति को मजबूत बनाता है। बिना नियम के जीवन इच्छाओं के प्रवाह में बहता रहता है। नियम उस प्रवाह पर बांध का कार्य करता है। जब मन किसी विषय से त्यागपूर्वक अलग होता है तभी वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव होता है।
जैन दर्शन में अविरति को कर्मबंध का बड़ा कारण बताया गया है। केवल किसी वस्तु का उपयोग न करना पर्याप्त नहीं है। उसके प्रति मन की आसक्ति भी समाप्त होनी चाहिए। यही कारण है कि त्याग को इतना महत्त्व दिया गया है। चातुर्मास छोटे छोटे नियमों के अभ्यास का सर्वोत्तम अवसर है क्योंकि इन्हीं से आत्मबल का निर्माण होता है।
धर्म साधना के लिए श्रद्धा ज्ञान और अनुभव इन तीनों का समन्वय आवश्यक है। श्रद्धा के बिना साधना में उत्साह नहीं आता। ज्ञान के बिना साधना की दिशा नहीं मिलती और अनुभव के बिना उसका आनंद नहीं मिलता। इसलिए चातुर्मास केवल पूजा पाठ का समय नहीं बल्कि धर्म को समझने और उसे जीवन में उतारने का काल भी है।
इन चार महीनों में स्वाध्याय ध्यान प्रतिक्रमण सामायिक जप मौन दान सेवा और तप का विशेष महत्त्व है। रात्रि भोजन का त्याग जीवदया और स्वास्थ्य दोनों की दृष्टि से लाभकारी है। ब्रह्मचर्य का अभ्यास मन और शरीर दोनों को स्थिरता देता है। नियमित प्रतिक्रमण आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया है जिससे मनुष्य अपने दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है।
इतिहास में ऐसे अनेक प्रेरक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने चातुर्मास की भावना को जीवन में उतारा। भगवान नेमिनाथ की प्रेरणा से श्रीकृष्ण ने वर्षाकाल में द्वारका से बाहर न जाने का संकल्प लिया। आचार्य हेमचन्द्र के प्रभाव से सम्राट कुमारपाल ने भी चार महीनों तक राज्य की यात्राएं स्थगित कर धर्मसाधना को प्राथमिकता दी। ये उदाहरण बताते हैं कि चातुर्मास केवल साधुओं के लिए नहीं बल्कि गृहस्थों के लिए भी आत्मअनुशासन का पर्व है।
आज परिस्थितियां बदल गई हैं। यात्रा के साधन बढ़ गए हैं और जीवन पहले से अधिक व्यस्त हो गया है। फिर भी चातुर्मास का संदेश आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। यदि हम चार महीनों में अपने व्यवहार को थोड़ा संयमित करें अनावश्यक यात्राएं घटाएं जीवदया का ध्यान रखें समय निकालकर स्वाध्याय करें और किसी एक दुर्व्यसन या बुरी आदत का त्याग कर दें तो यही चातुर्मास की वास्तविक साधना होगी।
वास्तव में चातुर्मास बाहर के मौसम से अधिक भीतर के मौसम को बदलने का नाम है। वर्षा धरती को हरियाली देती है और चातुर्मास आत्मा को हरियाली देता है। जैसे वर्षा के बिना खेत सूख जाते हैं वैसे ही आत्मचिंतन के बिना जीवन भी भीतर से बंजर हो जाता है। इसलिए इन चार महीनों को केवल पंचांग का एक कालखंड न मानकर आत्मजागरण का उत्सव बनाना चाहिए। यही वह समय है जब मनुष्य अपने भीतर के बीज को जागृत कर सकता है और धर्म संयम करुणा तथा आत्मविश्वास की ऐसी फसल उगा सकता है जो पूरे जीवन को सुगंधित कर दे।

(लेखक रिष्ठ पत्रकार साहित्यकार,-स्तम्भकार है)

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