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पुरुषार्थ से ही गुरु कृपा का पात्र बनता है शिष्य : साध्वी सिद्धेश्वरी भारती जी

वेब वार्ता सत्यम नागपाल,
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री सिद्धेश्वरी भारती जी ने अपने ओजस्वी विचारों के माध्यम से पुरुषार्थ और गुरु कृपा के गहरे आध्यात्मिक संबंध पर प्रकाश डाला। साध्वी जी ने कहा कि जीवन में गुरु कृपा का महत्व सर्वोपरि है, किन्तु गुरु कृपा का वास्तविक लाभ वही शिष्य प्राप्त कर सकता है, जो अपने जीवन में पुरुषार्थ करने के लिए तत्पर हो। केवल गुरु की कृपा की प्रतीक्षा करना पर्याप्त नहीं, अपितु उस कृपा को अपने जीवन में उतारने के लिए साधक का निरंतर प्रयास, अनुशासन व साधना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि गुरु कृपा उस प्रकाश के समान है, जो मार्ग को प्रकाशित करती है, लेकिन उस मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ शिष्य को स्वयं करना होता है। जब शिष्य अपने कर्मों, विचारों और जीवनशैली को गुरु के महान आदर्शों के अनुकूल ढालने का निरंतर प्रयास करता है तभी वह गुरु कृपा से लाभान्वित हो पाता है। साध्वी जी ने सुंदर उदाहरण देते हुए कहा कि हमें अन्न जल इत्यादि कुछ भी ग्रहण करने के लिए किसी पात्र की आवश्यकता होती है ठीक इसी प्रकार गुरु भी अपनी कृपा के पात्र को ढूंढते हैं, जब किसी शिष्य का हृदय निःस्वार्थ भाव व समर्पण से परिपूर्ण मिलता है तो गुरु अपनी अहैतुकी कृपा उस शिष्य पर लूटा देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि सच्चा पुरुषार्थ केवल सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने का प्रयास नहीं है अपितु वास्तविक पुरुषार्थ तो अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, आलस्य और नकारात्मक संस्कारों पर विजय प्राप्त करना है। जब शिष्य गुरु के दिव्य मार्ग पर श्रद्धा, विश्वास और निरंतरता के साथ चलता है, तब उसका पुरुषार्थ गुरु कृपा को ग्रहण करने का माध्यम बन जाता है। उन्होंने कहा कि गुरु कृपा शिष्य को सामर्थ्य प्रदान करती है और शिष्य का पुरुषार्थ उस सामर्थ्य को सार्थक दिशा देता है। दोनों का समन्वय ही साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। साध्वी जी ने उपस्थित साधकों को प्रेरित करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में गुरु की शिक्षाओं को केवल सुनना ही नहीं, अपितु उन्हें आचरण में भी उतारना चाहिए। नियमित साधना, सुमिरन, सत्संग, सेवा और सद्कर्मों के माध्यम से अपने जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने का निरंतर प्रयास ही सच्चा पुरुषार्थ है। सत्संग कार्यक्रम के अंत में साध्वी बहनों द्वारा सुमधुर भजनों का गायन किया गया। सामूहिक ध्यान-साधना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।

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