ब्रिक्स में भारत का कूटनीतिक दांव, पुतिन से मुलाकात के बाद अब जिनपिंग पर नजर; ट्रंप के दबाव से बेपरवाह मोदी

नई दिल्ली, 12 सितंबर (वेब वार्ता)। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की शुरुआत के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का स्पष्ट संदेश दिया है। पहले दिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकातों ने वैश्विक कूटनीति में भारत की संतुलित रणनीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सभी की नजरें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात पर टिकी हैं।

रूस और ईरान जैसे देशों के साथ भारत के बढ़ते संवाद को अमेरिका की नीतियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स मंच पर यह संकेत दिया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की नीति पर आगे बढ़ रहा है।

पुतिन और पेजेशकियान से मुलाकात ने खींचा ध्यान

ब्रिक्स सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। दोनों नेताओं की गर्मजोशी से हुई मुलाकात ने वैश्विक स्तर पर ध्यान खींचा। इसके बाद प्रधानमंत्री ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से भी बातचीत की।

भारत के लिए रूस और ईरान दोनों रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। रूस के साथ भारत के रक्षा, ऊर्जा और व्यापारिक संबंध लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं, जबकि ईरान भारत के लिए पश्चिम एशिया और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से अहम देश है।

इन मुलाकातों को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब अमेरिका की ओर से रूस और ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाया जाता रहा है। भारत का रुख हालांकि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों पर आधारित रहा है।

अब शी जिनपिंग के साथ मुलाकात पर टिकी निगाहें

ब्रिक्स सम्मेलन के अगले चरण में प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर विशेष नजर है। वर्ष 2023 में भारत की अध्यक्षता में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे। हालांकि, पिछले करीब डेढ़-दो वर्षों में भारत और चीन के संबंधों में कुछ नरमी के संकेत देखने को मिले हैं।

शी जिनपिंग का भारत दौरा इसी बदलते माहौल का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच सीमा विवाद, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत होने की संभावना है।

रणनीतिक आर्थिक संवाद पर भी हो सकती है चर्चा

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच रणनीतिक आर्थिक संवाद शुरू करने पर चर्चा हो सकती है। इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में बदलते हालात भी बातचीत के प्रमुख विषय हो सकते हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर पैदा हुई चिंताओं पर भी दोनों देश चर्चा कर सकते हैं। इस क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में भारत और चीन दोनों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

अमेरिका की ओर से लगाए गए शुल्क और उससे पैदा हुए व्यापारिक दबाव का मुद्दा भी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत और चीन दोनों अमेरिकी व्यापार नीतियों से प्रभावित हुए हैं। ऐसे में दोनों पक्ष वैश्विक व्यापारिक परिस्थितियों पर भी विचार कर सकते हैं।

सीमा विवाद और व्यापार के बीच संतुलन की चुनौती

भारत और चीन के बीच हाल के वर्षों में सीमा विवाद सबसे संवेदनशील मुद्दों में रहा है। दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक स्तर पर हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा भी शीर्ष नेतृत्व की बातचीत में हो सकती है।

चीन आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को तेजी से आगे बढ़ाने की इच्छा रखता है, जबकि भारत का जोर इस बात पर रहा है कि सीमा पर भरोसा बहाल हुए बिना आर्थिक संबंधों में पूरी गति संभव नहीं है। ऐसे में दोनों देश व्यापार और सीमा विवाद के बीच संतुलन बनाने के रास्ते तलाश सकते हैं।

लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। दोनों देशों के बीच सामान्य संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए व्यापार, आवागमन और अन्य क्षेत्रों में संवाद बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार पर भारत का जोर

ब्रिक्स के व्यापारिक मंच पर भारत ने सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके साथ डिजिटल भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने और डिजिटल व्यापार को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने की बात भी सामने रखी गई।

भारत ने सदस्य देशों से अपने बाजारों को अधिक खुला बनाने का भी आह्वान किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को आसान बनाना और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अधिक विकल्प तैयार करना है।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से देशों को विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने, डॉलर पर निर्भरता घटाने और वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रभाव को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

ईरान ने भी स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बताया अहम

ब्रिक्स मंच पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय मुद्रा में लेन-देन बढ़ाने के साथ मुद्रा संबंधी जोखिमों और आपसी भुगतान के निपटारे के लिए जरूरी व्यवस्था भी तैयार करनी होगी।

भारत और ईरान का इस मुद्दे पर समान रुख ब्रिक्स के भीतर वैकल्पिक व्यापारिक व्यवस्था को लेकर बढ़ती चर्चा को दर्शाता है।

स्टार्टअप और छोटे कारोबारों के लिए नई व्यवस्था

ब्रिक्स के भीतर भारत की पहल पर स्टार्टअप और नवाचार से जुड़े क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य शुरुआती और तेजी से बढ़ रहे स्टार्टअप को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

इसके साथ ब्रिक्स देशों के स्टार्टअप और उद्यमिता केंद्रों को आपस में जोड़ने वाला साझा नेटवर्क तैयार करने की योजना है। इससे भारतीय स्टार्टअप को दूसरे सदस्य देशों के बाजारों और उद्यमिता केंद्रों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है।

छोटे कारोबारियों के लिए ब्रिक्स ऋण व्यवस्था तैयार करने पर भी जोर है। इसके माध्यम से छोटे निर्यातकों के लिए केवल संपत्ति या अन्य जमानत के आधार पर नहीं, बल्कि उनके नकदी प्रवाह को ध्यान में रखते हुए ऋण उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

लघु उद्योगों के लिए साझा डिजिटल मंच

ब्रिक्स देशों के लघु, छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए एक साझा डिजिटल मंच विकसित करने की दिशा में भी पहल की जा रही है। इसमें छोटे उद्योगों के साथ बैंक, व्यापार संगठन, प्रौद्योगिकी केंद्र और सरकारी संस्थानों को जोड़े जाने का लक्ष्य है।

इस व्यवस्था से भारतीय छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए ब्रिक्स के अन्य बाजारों तक पहुंच आसान होने की उम्मीद है।

वैश्विक मूल्य शृंखला में सहयोग पर जोर

भारत की अध्यक्षता में 2026 से 2030 के लिए वैश्विक मूल्य शृंखला कार्ययोजना को आगे बढ़ाने पर भी काम हो रहा है। इसके तहत ब्रिक्स देशों के बीच आपूर्ति शृंखला और निवेश सहयोग को मजबूत करने की संभावना है।

दवा उद्योग और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मजबूत आपूर्ति शृंखला तैयार करना इसका अहम हिस्सा हो सकता है। इससे सदस्य देशों की परस्पर आर्थिक निर्भरता और सहयोग को नई दिशा मिल सकती है।

यूरोपीय संघ के साथ भी व्यापारिक रिश्ते आगे

भारत की कूटनीतिक रणनीति को केवल ब्रिक्स तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। एक ओर भारत ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर रूस, ईरान और चीन के साथ संवाद बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।

यूरोपीय आयोग की ओर से इससे संबंधित प्रस्ताव यूरोपीय परिषद की ओर बढ़ाए जाने की खबरों के बीच भारत की बहुस्तरीय आर्थिक कूटनीति चर्चा में है।

इस पूरे घटनाक्रम से भारत का संदेश स्पष्ट दिखाई देता है कि वह किसी एक शक्ति समूह के साथ बंधकर नहीं, बल्कि अपने आर्थिक, सामरिक और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है। ब्रिक्स में पुतिन और पेजेशकियान से मुलाकात के बाद अब शी जिनपिंग के साथ बातचीत इस रणनीति का अगला महत्वपूर्ण अध्याय हो सकती है।

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