दुबई, 17 जून (वेब वार्ता)। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ हुए युद्ध विराम समझौते का पूर्ण पालन तब तक संभव नहीं होगा, जब तक इजराइली सेना लेबनान के उन क्षेत्रों से वापस नहीं लौटती जिन पर संघर्ष के दौरान कब्जा किया गया है। उनके इस बयान ने पश्चिम एशिया में शांति बहाली की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
अराघची ने कहा कि लेबनान में इजराइली सैन्य मौजूदगी युद्ध विराम समझौते की भावना के विपरीत है और जब तक यह स्थिति बनी रहती है, तब तक संघर्ष को पूरी तरह समाप्त मानना कठिन होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों को समझौते की शर्तों का सम्मान करना होगा।
दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान की इस मांग को अस्वीकार कर दिया है। नेतन्याहू ने कहा कि लेबनान में इजराइली सेना की तैनाती सुरक्षा आवश्यकताओं के आधार पर जारी रहेगी और सेना तब तक वहां मौजूद रहेगी जब तक उसे आवश्यक समझा जाएगा।
अमेरिकी अधिकारियों ने भी संकेत दिया है कि उनके द्वारा तैयार किए गए युद्ध विराम प्रस्ताव में लेबनान से इजराइली सेना की वापसी को अनिवार्य शर्त के रूप में शामिल नहीं किया गया था। ऐसे में ईरान की नई मांग ने समझौते की व्याख्या और उसके क्रियान्वयन को लेकर मतभेद बढ़ा दिए हैं।
क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण मानवीय स्थिति भी गंभीर बनी हुई है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाइयों में हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में नागरिकों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। इससे मानवीय संकट और गहरा गया है।
इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने भी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब जिनेवा में प्रस्तावित औपचारिक समझौते पर टिकी हुई है, जहां युद्ध विराम को स्थायी रूप देने के प्रयास किए जाने हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि लेबनान में इजराइली सैन्य उपस्थिति और ईरान की मांगों को लेकर कोई साझा समाधान नहीं निकलता, तो शांति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। साथ ही क्षेत्रीय अस्थिरता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर भी पड़ सकता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में होने वाली वार्ताएं यह तय करेंगी कि युद्ध विराम समझौता स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ता है या फिर नए मतभेद क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा देते हैं।




