नई दिल्ली, 10 जून (वेब वार्ता)। तृणमूल कांग्रेस और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद सुष्मिता देव ने अपने फैसले को लेकर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि उनका राजनीतिक भविष्य असम से जुड़ा हुआ है और तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए वह वहां प्रभावी राजनीति नहीं कर सकती थीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके इस्तीफे को किसी अन्य सांसद के फैसले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उनकी परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं।
सुष्मिता देव ने कहा कि उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा भेजा गया था, लेकिन उनकी राजनीतिक जमीन हमेशा से असम रही है। असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन किया और महसूस किया कि राज्य की सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने के लिए उन्हें नया रास्ता चुनना होगा।
उन्होंने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की कार्यशैली और राज्य में हुए विकास कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में असम में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। उनका मानना है कि यदि उन्हें जनता की सेवा करनी है तो मुख्यमंत्री के साथ मिलकर काम करना अधिक प्रभावी होगा।
सुष्मिता देव ने कहा, “असम में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के शासन में जमीन-आसमान का अंतर है। भारतीय जनता पार्टी के शासन में काफी काम हुआ है। मुझे जनता की सेवा करनी है और मुख्यमंत्री असम के प्रमुख हैं। वह मेरे मार्गदर्शक हैं। मुझे लगा कि इस्तीफा देने के बाद सबसे पहले मुझे उन्हीं से मिलना चाहिए। उनके साथ काम करना मेरे लिए और असम के लिए बेहतर रहेगा।”
भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि यह फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है। हालांकि, उन्होंने संकेत दिए कि वह असम के विकास और जनता के हित को प्राथमिकता देते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में काम करना चाहती हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए सुष्मिता देव ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस को चुनावी नतीजों और जनता की प्रतिक्रिया का आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद बनी परिस्थितियां उन्हें सकारात्मक नहीं लगीं और पार्टी की छवि को लेकर भी उनके मन में सवाल पैदा हुए।
उन्होंने कहा, “ममता दीदी क्यों हारीं, इसका जवाब उन्हें स्वयं तलाशना होगा। चुनाव के बाद की स्थिति मुझे अच्छी नहीं लगी, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की छवि मुझे प्रभावित नहीं कर सकी। जनता सबसे ऊपर होती है और असम के लिए मेरा यह फैसला सही है। मैंने अपने परिवार से चर्चा करने के बाद ही यह निर्णय लिया है।”
टीएमसी के बागी सांसदों को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस विषय में कोई जानकारी नहीं है और न ही वह इस पर कोई टिप्पणी करना चाहती हैं।
सुष्मिता देव ने ‘इंडिया’ गठबंधन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक दलों का एक मंच पर आ जाना चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होता। मतदाताओं का विश्वास जीतने के लिए मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट विचारधारा, विकास का एजेंडा और भरोसेमंद राजनीतिक संदेश जरूरी होता है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई यह मानकर चल रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विरोधी मत स्वतः किसी गठबंधन के पक्ष में चले जाएंगे, तो यह राजनीतिक भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। लोकतंत्र में जनता अपने अनुभव और विश्वास के आधार पर निर्णय लेती है।
हालिया विपक्षी बैठकों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गठबंधन के भीतर अभी भी कई मुद्दों पर स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा, “आठ जून को ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक हुई, लेकिन उसमें कई प्रमुख सहयोगी दलों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही। कौन किसे कितनी सीट देगा और आगे की रणनीति क्या होगी, इस पर अब भी तस्वीर स्पष्ट नहीं है।”
सुष्मिता देव ने अंत में कहा कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता के हाथ में होता है। जनता ही तय करती है कि कौन उसके हित में काम कर रहा है और किसके दावे वास्तविकता से मेल खाते हैं। ऐसे में आने वाले समय में असम की राजनीति में उनकी नई भूमिका को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।




