-विश्व में पहली बार ऐसी तकनीकी का किया गया इस्तेमाल
-हार्ट के मरीजो के लगने वाले इंजेक्शन से खोला आंख में जमा खून का थक्का
-हरी शंकर शर्मा
कानपुर, 19 मई (वेबवार्ता)। जीएसएवीएम मेडिकल कालेज के नेत्र रोग विभाग के डाक्टरो की टीम ने एक विश्वस्तरीय ऑपरेशन कर कालेज के नाम के साथ ही प्रदेश व देश का नाम गौरवांवित किया गया। नेत्र रोग विभागध्यक्ष डॉ परेवेज खान व उनकी टीम ने एक 30 वर्षीय महिला की बिना आंख खोले गंभीर रक्तस्राव का सफल उपचार कर उसे नई रोशनी दी।
नेत्र रोग विभागध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने बताया कि कानपुर के गोविंद नगर निवासी 30 वर्षीय महिला सीमा आंख में दर्द और न दिखने की समस्या को लेकर ओपीडी में आयी थी। उनकी आंख में परिवार के एक सदस्य की कोहनी लगने से आंख की रेटिना की पर्त के अन्दर गंभीर चोट लग। चोट लगने के बाद आंख बाहर की ओर उभरी हई प्रतीत हो रही थी तथा आंख का दबाव (आई प्रशर) इतना अधिक था कि उसे रिकॉर्ड करना भी संभव नहीं हो पा रहा था।
उन्होंने बताया कि महिला सीमा की जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड में आंख के भीतर रक्तस्राव के कारण कोरॉयडल डिटैचमेंट पाया गया, जिससे किप्रिंग कोरॉयड की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इस गंभीर स्थिति के कारण रोगी की दृष्टि समाप्त हो चुकी थी तथा उसे अत्यधिक असहनीय दर्द हो रहा था। आंख के अंदर रक्त का थक्का (क्लॉट) भी बन गया था। सामान्यतः ऐसी स्थिति में रक्त के थक्के के स्वाभाविक रूप से घुलने की प्रतीक्षा लगभग 15-20 दिनों तक की जाती है, उसके बाद ही थक्के को निकालने की प्रक्रिया संभव होती है।
लेकिन इस मामले में प्रो. डॉ. परवेज खान ने एक नवीन दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने टेनेक्टेप्लेस नामक तृतीय पीढ़ी की थ्रोम्बोलाइटिक दवा का उपयोग किया, जिसकी कीमत बाजार में लगभग 40 हजार रूपये है जिसको कार्डियोलॉजी के निदेशक प्रो. डॉ. राकेश वर्मा ने तुंरत ही निःशुल्क उपलब्ध करवाया। इस दवा का प्रयोग साधारण तौर पर हृदयाघात (हार्ट अटैक/एमआई) के रोगियों में हृदय की रक्त वाहिकाओं में बने थक्कों को घोलने के लिए किया जाता है।
इस पर डॉ. परवेज खान ने अपनी पेटेंटेड सुई के माध्यम से इस दवा को आंख के सुपाकोरॉयडल स्पेस में इंजेक्ट किया। इसके पश्चात मात्र 24 घंटे के अंदर उसी पेटेंटेड सुई की सहायता से आंख को खोले बिना, अर्थात बिना किसी बड़ी सर्जरी के, रक्त के थक्के को सफलतापूर्वक बाहर निकाला गया।
प्रो. डॉ. परवेज खान ने बताया कि यह उपचार नेत्र चिकित्सा में एक नवीन और कम आक्रामक (मिनिमली इनवेसिव) तकनीक के रूप में महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हो सकता है, जो भविष्य में गंभीर आंखों के रक्तस्राव वाले रोगियों के उपचार के लिए नई संभावनाएं खोलेगा। इस सफल उचार करने वाली टीम में प्रमुख रूप से डॉ. पारूल, डॉ. शुभांशी, डॉ. शिवांग, डॉ. रोहित, डॉ. अर्जिता, डॉ. शिवांशी व डॉ. आंचल रही।




