हुमैरा साबिर की कहानी उन्ही की ज़ुबानी
बहराइच। दुनिया के तमाम मुल्कों में ‘तयशुदा शादियों’ (अरेंज्ड मैरिज) का कोई वजूद नहीं है; वहां ज़िंदगी के फ़ैसले दिल की पसंद पर होते हैं। मगर हिंदुस्तान की मिट्टी का मिज़ाज जुदा है। ‘इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे’ (IHDS) के आंकड़े बताते हैं कि आज भी हमारे मुल्क में करीब 90 से 93 फीसदी शादियां पारंपरिक तरीके से परिवार तय करता है। प्रेम विवाह का दायरा महज़ 5 से 7 फीसदी तक सिमटा है, और बाकी 2 से 3 फीसदी में सेमी-अरेंज्ड रिश्ते आते हैं।
विडंबना यह है कि सामाजिक ताने-बाने से बगावत करके होने वाली इन्हीं 7 फीसदी शादियों में बिखराव का दर्द कहीं ज़्यादा गहरा है। जहां अरेंज्ड मैरिज में तलाक या अलगाव की दर महज़ 1 से 2 फीसदी के आसपास ठहरती है, वहीं प्रेम विवाह में यह आंकड़ा बढ़कर 5 फीसदी के पार निकल जाता है। सवाल उठता है कि जिस रिश्ते की नींव मोहब्बत, भरोसे और ख्वाबों पर रखी गई, उसमें इतनी नफ़रत और दुराव की दरारें कैसे पड़ जाती हैं? इसका जवाब किसी आंकड़े में नहीं, उस सामाजिक क्रूरता में छिपा है जो शादी के बाद एक औरत को बिल्कुल अकेला कर देती है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच की हुमैरा की दास्तान उसी कड़वी हकीकत का जीता-जागता और लहूलुहान दस्तावेज़ है।
करीब पंद्रह साल पहले की बात है। हुमैरा की आंखों में अपनी पसंद का जहां बसाने का ख्वाब था। उसने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर असलम नाम के युवक का हाथ थाम लिया। मजहब एक था, मगर जात की दीवार आड़े आ गई। घर के भीतर एक तूफान उठ खड़ा हुआ। मां की ममता पर रंजिश का पर्दा पड़ गया और जिस भाई के साथ हुमैरा एक ही थाली में निवाला बांटकर बड़ी हुई थी, उसका दिल ऐसा टूटा कि उसने बहन से हमेशा के लिए मुंह फेर लिया। वही भाई, जो कभी बहन के आंचल पर धूप भी नहीं आने देता था, आज राह चलते उससे नज़र तक नहीं मिलाता।
पढ़ने और सुनने में यह सिर्फ एक पारिवारिक नाराजगी लगती है, मगर भारतीय समाज में जब मायके की चौखट का साया किसी बेटी के सिर से उठता है, तो वह हवा में उड़ती उस कटी पतंग की तरह हो जाती है जिसकी डोर कट चुकी हो।
यहीं से असलम के भीतर का वह पुरुष जाग उठा जिसे पता था कि इस औरत की पुकार सुनने वाला ज़माने में कोई नहीं। उसे गुरूर था कि हुमैरा के पीछे खड़े होने वाला कोई बाप या भाई नहीं बचा। मोहब्बत का मुखौटा उतरने में देर नहीं लगी। छोटी-छोटी बातों पर गालियां, बेरहम मार-पीट और बेरुखी हुमैरा का रोज़ का मुकद्दर बन गई। असलम की अय्याशियां बढ़ती गईं, उसने गैर-औरतों और दूसरे निकाह का रास्ता चुन लिया। जिस घर को हुमैरा ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर बसाया था, वही उसके लिए कैदखाना बन गया।
जब जुल्म बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो मासूम बेटी और बेटे का हाथ थामे हुमैरा ने खुद को उस रिश्ते से अलग करने की हिम्मत जुटाई। बात थाने तक पहुंची और पुलिस के सामने तलाक के कागज़ात पर दस्तखत हो गए। मगर क्या हमारे समाज में कागज़ का एक टुकड़ा किसी बेसहारा औरत को दरिंदे से महफ़ूज़ रख सकता है?
असलम अच्छी तरह जानता था कि हुमैरा के आंगन की हिफाज़त के लिए कोई दीवार मौजूद नहीं है। बच्चों से मिलने का बहाना बनाकर वह जब चाहता, घर में घुस आता। कभी रुपयों की मांग, कभी बच्चों के सामने हुमैरा पर हाथ उठाना। इनकार करने पर घर का फ्रिज पटक देना, टीवी चकनाचूर कर देना और जो भी जमा-पूंजी मिलती, छीनकर ले जाना उसका रोज़ का तमाशा बन गया। हुमैरा ने कई बार थाने की दहलीज पर आंसू बहाए, मगर पुलिस ने हर बार इसे ‘आपसी घरेलू कलह’ कहकर पल्ला झाड़ लिया।
प्रशासन की इसी बेरुखी और मायके की चुप्पी ने असलम के हौसले इतने बढ़ा दिए कि पिछले दिनों वह जबरन घर में दाखिल हुआ। उसने बच्चों के निवाले और भविष्य के लिए जोड़े गए अस्सी हज़ार रुपये नकद और लगभग इतने ही के ज़ेवरात समेटे और मुंबई भाग निकला। पीछे छोड़ गया सिर्फ हुमैरा की चीखें, सहमे हुए दो मासूम बच्चे और टूटे हुए सामान का मलबा।
यह सिर्फ हुमैरा के आंसुओं की दास्तान नहीं है। यह हमारे समाज के उस दोगले चेहरे की तस्वीर है, जहां प्रेम विवाह करने वाली लड़की को मायका और ससुराल—दोनों तरफ से लावारिस छोड़ दिया जाता है। मुसीबत में जब वह मायके की तरफ देखती है, तो ताना मिलता है: “अपनी मर्जी से किया था, अब खुद भुगतो।”
इसी तन्हाई और बेबसी का फायदा ऐसे जालिम उठाते हैं। जिस लड़की ने दुनिया से सिर्फ इसलिए बगावत की थी कि उसे प्यार पर यकीन था, समाज ने उसे सबक सिखाने के नाम पर एक भेड़िए के आगे अकेला छोड़ दिया। क्या अपनों की एक खता की सजा इतनी बड़ी होनी चाहिए कि उसकी चीखें सुनने के लिए कोई अपना कान ही न बचे?




