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चकबंदी प्रक्रिया से छह जिलों के 13 गांव बाहर, लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी

लखनऊ, 18 सितंबर (वेब वार्ता)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर उत्तर प्रदेश में वर्षों से लंबित चकबंदी प्रक्रियाओं को जल्द पूरा कराने की कार्रवाई तेज कर दी गई है। सरकार का उद्देश्य किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के साथ-साथ भूमि संबंधी मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करना है।

चकबंदी आयुक्त डॉ. हृषिकेश भास्कर यशोद के निर्देश पर छह जिलों के 13 गांवों को उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम की धारा 6(1) के तहत चकबंदी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। इन गांवों में कई स्थानों पर चकबंदी प्रक्रिया एक दशक से लेकर 35 वर्षों तक लंबित थी।

35 वर्षों से लंबित थी मैनपुरी के गांव की प्रक्रिया

चकबंदी प्रक्रिया से बाहर किए गए गांवों में मैनपुरी का भांती गांव शामिल है, जहां पिछले 35 वर्षों से चकबंदी की प्रक्रिया लंबित थी। इसके अलावा बदायूं का सिरतौल गांव 14 वर्षों से चकबंदी प्रक्रिया में था।

उन्नाव के दरौली, पीखी, सर्लीद और निहालपुर तथा लखनऊ के शिवपुरी गांव में भी पिछले 12 वर्षों से चकबंदी प्रक्रिया लंबित थी। वहीं, बरेली का कादरगंज गांव 10 वर्षों से इस प्रक्रिया का इंतजार कर रहा था।

इसके अतिरिक्त बिजनौर के हसनअलीपुर और बैबलवाला तथा बदायूं के बक्सेना और इमलिया गांवों को भी चकबंदी प्रक्रिया से अलग किया गया है।

कई कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रही थी प्रक्रिया

अधिकारियों के अनुसार, इन गांवों में चकबंदी प्रक्रिया आगे बढ़ाने में विभिन्न प्रकार की बाधाएं सामने आ रही थीं। कुछ गांव विकास योजनाओं में शामिल हो गए थे, जबकि कुछ क्षेत्र नदी के कटान से प्रभावित थे।

इसके अलावा कई गांवों में चकबंदी योग्य भूमि का क्षेत्रफल 40 प्रतिशत से कम रह गया था। कुछ गांव औद्योगिक विकास क्षेत्र में शामिल हो चुके थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए संबंधित गांवों को चकबंदी प्रक्रिया से बाहर करने का निर्णय लिया गया है।

मुजफ्फरनगर के गांव में 16 वर्ष बाद पूरी हुई चकबंदी

वहीं, मुजफ्फरनगर के पीपलशाह गांव में पिछले 16 वर्षों से लंबित चकबंदी प्रक्रिया को अब पूरा कर लिया गया है। अधिकारियों के लगातार प्रयासों के बाद उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम की धारा 52(1) के तहत प्रक्रिया पूरी की गई।

इस कार्रवाई को लंबे समय से लंबित भूमि संबंधी मामलों के निस्तारण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे संबंधित किसानों को भूमि अभिलेखों और सरकारी योजनाओं से जुड़े मामलों में राहत मिलने की उम्मीद है।

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