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कपसाड़ कांड में नया मोड़: कोर्ट में दी पारस की 10वीं की मार्कशीट, नाबालिग घोषित हुआ तो क्या बदलेगा पूरा केस?

कपसाड़ (मेरठ), अपराध डेस्क | वेब वार्ता

कपसाड़ में सुनीता की निर्मम हत्या और उसकी नाबालिग बेटी रूबी के अपहरण के मामले में एक अहम कानूनी मोड़ सामने आया है। इस सनसनीखेज कांड के मुख्य आरोपी पारस सोम चौधरी को लेकर अब उसकी उम्र पर सवाल खड़े कर दिए गए हैं। आरोपी वर्तमान में चरण सिंह जिला कारागार में बंद है, लेकिन उसके पिता योगेश ने कोर्ट में दायर याचिका के जरिए दावा किया है कि पारस नाबालिग है।

कोर्ट में पेश की गई 10वीं की मार्कशीट

बचाव पक्ष ने एससी-एसटी कोर्ट में जज असलम सिद्दीकी के समक्ष प्रार्थना पत्र दाखिल करते हुए पारस की 10वीं कक्षा की मार्कशीट प्रस्तुत की है। याचिका में कहा गया है कि उपलब्ध शैक्षणिक दस्तावेजों के अनुसार आरोपी की उम्र घटना के समय 18 वर्ष से कम थी। इसी आधार पर मांग की गई है कि पारस को नाबालिग घोषित किया जाए और पूरे मामले को किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) में स्थानांतरित किया जाए।

नाबालिग घोषित होने पर क्या बदलेगा?

अगर कोर्ट आरोपी पारस को नाबालिग मान लेती है, तो यह मामला पूरी तरह से अलग कानूनी दिशा में चला जाएगा। वर्तमान में आरोपी पर गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा चल रहा है, जिनमें आजीवन कारावास या फांसी तक का प्रावधान हो सकता है। लेकिन नाबालिग घोषित होने की स्थिति में ऐसे कठोर दंड लागू नहीं होंगे।

  • मामला सत्र न्यायालय से हटाकर किशोर न्याय बोर्ड को सौंपा जाएगा
  • नाबालिग को जेल नहीं, सुधार गृह में रखा जाएगा
  • अधिकतम सजा तीन वर्ष तक की सुधारात्मक अवधि हो सकती है
  • फांसी या आजीवन कारावास जैसे दंड नहीं दिए जा सकते
  • सुधार और पुनर्वास पर जोर रहेगा, न कि दंड पर

उम्र तय करने की प्रक्रिया क्या होती है?

कानून के अनुसार किसी आरोपी की उम्र तय करने के लिए सबसे पहले स्कूल प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र या बोर्ड की मार्कशीट को आधार बनाया जाता है। यदि इन दस्तावेजों में संदेह हो, तो मेडिकल जांच यानी बोन टेस्ट कराया जाता है। कोर्ट सभी तथ्यों और रिपोर्टों के आधार पर यह तय करती है कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था या नहीं।

पीड़ित पक्ष की बढ़ सकती है चिंता

इस घटनाक्रम के बाद पीड़ित पक्ष और स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। सुनीता की हत्या और रूबी के अपहरण ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। ऐसे में आरोपी के नाबालिग घोषित होने की संभावना को लेकर यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या पीड़ित परिवार को पूरा न्याय मिल पाएगा। कई लोग इसे न्याय प्रक्रिया की सबसे संवेदनशील कसौटी मान रहे हैं।

प्रॉसिक्यूशन क्या कर सकता है?

अभियोजन पक्ष बचाव पक्ष की दलीलों को चुनौती दे सकता है। यदि उसे दस्तावेजों में किसी प्रकार की विसंगति या संदेह दिखाई देता है, तो वह मेडिकल जांच या अन्य सबूतों के जरिए यह साबित करने की कोशिश करेगा कि आरोपी बालिग है। अंतिम फैसला कोर्ट के विवेक और प्रस्तुत साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष: फैसले से तय होगी केस की दिशा

कपसाड़ कांड में आरोपी पारस की उम्र को लेकर उठे सवाल ने पूरे मामले की दिशा बदलने की आशंका पैदा कर दी है। अगर कोर्ट उसे नाबालिग मान लेती है, तो न सिर्फ सजा का स्वरूप बदलेगा, बल्कि न्याय प्रक्रिया भी पूरी तरह अलग मंच पर चलेगी। आने वाले दिनों में कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि यह मामला सख्त दंड की ओर जाएगा या सुधारात्मक न्याय की राह पकड़ेगा।

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