-लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई। लोकतंत्र में प्रशासन, राजनीति और कानून तीन ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बीच संतुलन ही व्यवस्था की मजबूती का आधार माना जाता है। किंतु जब यही तीनों एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देने लगें, तब घटनाएं केवल घटनाएं नहीं रह जातीं, बल्कि व्यवस्था के चरित्र पर प्रश्नचिह्न बन जाती हैं। शाहाबाद तहसील क्षेत्र के परियल गांव में घटित हालिया घटनाक्रम भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है, जिसने प्रशासनिक अधिकार, राजनीतिक प्रभाव और कानून की निष्पक्षता को लेकर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहानी की शुरुआत एक सामान्य प्रशासनिक निरीक्षण से हुई। शाहाबाद के उपजिलाधिकारी सुशील मिश्रा परियल गांव स्थित अन्नपूर्णा भवन का निरीक्षण करने पहुंचे थे। निरीक्षण के दौरान व्यवस्थाओं में कुछ कमियां सामने आईं, जिन पर उन्होंने आपत्ति जताई। इसी बीच गांव के प्रधान प्रतिनिधि उदयवीर सिंह भी वहां पहुंच गए। संवाद आरंभ हुआ, किंतु शीघ्र ही वह संवाद विवाद में बदल गया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच शब्दों की मर्यादा टूटने लगी और प्रशासनिक अधिकार तथा स्थानीय राजनीतिक प्रभाव आमने-सामने आ खड़े हुए।
यदि घटनाक्रम यहीं समाप्त हो जाता, तो इसे प्रशासनिक असहमति का एक सामान्य प्रसंग माना जा सकता था। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को एक अलग दिशा दे दी। आरोप है कि एसडीएम ने अपने पदाधिकार का प्रयोग करते हुए प्रधान प्रतिनिधि उदयवीर सिंह को अपने वाहन में बैठा लिया। यह सूचना गांव में फैली तो परिजन और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। देखते ही देखते तनाव बढ़ा और फिर वह हिंसा में परिवर्तित हो गया।
इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंताजनक था। सरकारी वाहन में तोड़फोड़ हुई, हाथापाई के आरोप लगे और उपजिलाधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके सिर से बहता रक्त केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं था, बल्कि शासन व्यवस्था की गरिमा पर भी एक गहरी चोट के रूप में देखा गया। क्योंकि किसी प्रशासनिक अधिकारी पर हमला वस्तुतः उस राज्य व्यवस्था को चुनौती माना जाता है, जिसका वह प्रतिनिधि होता है।
घटना की सूचना मिलते ही प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हुआ। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक मौके पर पहुंचे। कठोर कार्रवाई के आश्वासन दिए गए। उस समय यह प्रतीत हो रहा था कि कानून शीघ्रता से अपना मार्ग तय करेगा और दोषियों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई होगी। किंतु इसके बाद घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।
जैसे-जैसे मामला सार्वजनिक विमर्श का विषय बना, वैसे-वैसे राजनीति की सक्रियता भी बढ़ती गई। विपक्ष ने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता और शासन की कमजोरी का उदाहरण बताया, जबकि सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने घटना के दूसरे पक्ष को सामने लाने का प्रयास किया। धीरे-धीरे मामला कानून और प्रशासन की सीमाओं से निकलकर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे उदयवीर सिंह का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वह ऐसे परिवार से आते हैं, जिसका परियल और आसपास के क्षेत्र की राजनीति में दशकों से प्रभाव रहा है। उनकी माता शिवरानी लंबे समय तक ग्राम प्रधान रहीं, जबकि उनके पिता लाला राम राजपूत जिले की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। बसपा, सपा और भाजपा—तीनों राजनीतिक दौरों में वे तीन बार जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए। स्वाभाविक है कि ऐसी पृष्ठभूमि वाले परिवार से जुड़े विवाद को केवल प्रशासनिक घटना मान लेना आसान नहीं है।
घटनाक्रम का अगला अध्याय तब खुला, जब क्षेत्रीय विधायक एवं प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी तथा भाजपा जिलाध्यक्ष अजीत सिंह बब्बन परियल पहुंचे। उन्होंने उदयवीर सिंह और उनके परिजनों से मुलाकात कर न्याय दिलाने का भरोसा दिया। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का जनता के बीच जाना उनका दायित्व है, किंतु इस मुलाकात ने एक नई बहस को जन्म दे दिया। चर्चा होने लगी कि जब एक प्रशासनिक अधिकारी गंभीर हमले का शिकार हुआ है, तब सत्ता पक्ष की प्राथमिकता किस ओर दिखाई दे रही है।
इसी क्रम में घटनाक्रम का एक और संवेदनशील पहलू सामने आया। क्षेत्रीय विधायक एवं प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी की परियल यात्रा को उस परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने से भी जोड़ा गया, जिसकी बेटी की मृत्यु को लेकर क्षेत्र में चर्चाएं चल रही हैं। क्षेत्र में यह बात तेजी से फैली कि पुलिस कार्रवाई और पिता की गिरफ्तारी से उत्पन्न मानसिक तनाव के कारण युवती की मृत्यु हुई। हालांकि पुलिस प्रशासन ने इन दावों का स्पष्ट रूप से खंडन करते हुए कहा कि युवती की मौत का इस पूरे प्रकरण से कोई संबंध नहीं है और इस प्रकार की चर्चाएं तथ्यात्मक आधार से परे हैं। इसके बावजूद मंत्री का गांव पहुंचना और परिजनों से मुलाकात करना सामाजिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया। इससे यह धारणा भी बनी कि परियल का विवाद अब केवल उपजिलाधिकारी पर हमले और प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उससे जुड़े मानवीय, सामाजिक और राजनीतिक आयाम भी लगातार उभर रहे हैं।
यहीं से यह मामला राजनीतिक संकेतों और सामाजिक समीकरणों का हिस्सा बन गया। शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक संरचना पर दृष्टि डालें तो लोध समाज यहां एक प्रभावशाली मतदाता वर्ग के रूप में देखा जाता है। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वोट बैंक किसी भी दल की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे में यह प्रश्न भी उठने लगा कि कहीं इस पूरे घटनाक्रम के पीछे राजनीतिक दलों की अपने-अपने सामाजिक आधार को सुरक्षित रखने की चिंता तो सक्रिय नहीं है।
इसी बिंदु पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या कानून अपने निर्धारित मार्ग पर चल रहा है, अथवा राजनीतिक समीकरण उसकी गति और दिशा को प्रभावित कर रहे हैं? यदि एक उपजिलाधिकारी पर कथित हमले जैसे गंभीर मामले में भी कई दिनों तक एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती, तो सामान्य नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कानून की वास्तविक शक्ति आखिर कितनी है।
निस्संदेह यदि किसी अधिकारी ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि अथवा ग्रामीण के साथ अन्याय हुआ है तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि कानून का स्थान भीड़ नहीं ले सकती और राजनीतिक प्रभाव कभी भी न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता।
आज परियल का यह घटनाक्रम केवल एक गांव की सीमा में बंधी घटना नहीं रह गया है। यह उस व्यापक संघर्ष का प्रतीक बन चुका है, जिसमें प्रशासन अपने अधिकार और गरिमा की रक्षा करना चाहता है, राजनीति अपने जनाधार को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रही है और कानून दोनों के बीच अपनी निष्पक्षता सिद्ध करने की चुनौती से जूझ रहा है।
घटना के कई दिन बाद भी सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो पहले दिन था—क्या कानून बिना किसी दबाव, प्रभाव और राजनीतिक गणना के अपना कार्य कर पाएगा? क्योंकि यदि एक उपजिलाधिकारी पर हुए कथित हमले के मामले में भी न्याय की प्रक्रिया सत्ता और समीकरणों के बीच उलझ जाए, तो यह केवल एक अधिकारी का नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र के मनोबल का प्रश्न बन जाता है।
और तब समाज के मन में एक आशंका जन्म लेती है—कहीं ऐसा तो नहीं कि कानून की पुस्तक खुली हुई है, पर उसके पन्ने न्याय की उंगलियों से नहीं, बल्कि राजनीति की हवाओं से पलटे जा रहे हैं।




