-“बरामदगी के आंकड़ों से नहीं, परिणामों से तय होगी सफलता”
ललितपुर, 11 जून (वेब वार्ता)। आबकारी विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने एक बार फिर ग्राम चीरा में छापेमारी कर 125 लीटर अवैध कच्ची शराब बरामद की, 5000 किलो लहन नष्ट किया और पांच महिलाओं को गिरफ्तार कर मुकदमा दर्ज कराया। कार्रवाई के बाद विभाग ने इसे बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन सवाल यह है कि यदि हर बार कुछ महीनों में इसी गांव से इतनी बड़ी मात्रा में शराब और लहन बरामद हो रहा है तो आखिर विभाग की कार्रवाई का स्थायी प्रभाव कहां दिखाई दे रहा है?
ग्राम चीरा का नाम अवैध शराब निर्माण के मामलों में कोई नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से यहां समय-समय पर छापेमारी होती रही है। हर बार बरामदगी के आंकड़े सामने आते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं और आबकारी विभाग की ओर से सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद कुछ समय बाद हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि विभाग समस्या के मूल कारणों को समाप्त करने के बजाय केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आबकारी विभाग में जब भी कोई नया अधिकारी जिले में कार्यभार संभालता है, शुरुआती दिनों में अवैध शराब के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाता है और उसकी खबरें प्रमुखता से मीडिया में भेजी जाती हैं। लेकिन अभियान की निरंतरता और प्रभावशीलता पर अक्सर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। यदि कार्रवाई वास्तव में प्रभावी होती तो एक ही गांव बार-बार अवैध शराब निर्माण का केंद्र नहीं बनता।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासन ने अब तक उन परिवारों के पुनर्वास की दिशा में कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना लागू नहीं की है जो वर्षों से इस कार्य में लगे हुए हैं। केवल मुकदमे दर्ज करने और शराब नष्ट करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि ऐसे परिवारों को रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास और सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए ताकि वे अवैध धंधे पर निर्भर न रहें।
यदि हर बार छापेमारी के बाद कुछ हजार किलो लहन और कुछ सौ लीटर शराब बरामद हो रही है, तो यह विभाग की सफलता से ज्यादा इस बात का प्रमाण है कि अवैध कारोबार लगातार जारी है। सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी मात्रा में अवैध शराब बनाने की तैयारी प्रशासन और विभाग की नजरों से लंबे समय तक कैसे बची रहती है?
चीरा में अवैध शराब के खिलाफ असली जीत तब होगी जब वहां छापेमारी की आवश्यकता ही न पड़े। जब गांव के लोग वैकल्पिक रोजगार अपनाकर मुख्यधारा से जुड़ें और अवैध शराब का कारोबार इतिहास बन जाए। फिलहाल तो बार-बार की जा रही वही कार्रवाई विभाग की उपलब्धि कम और व्यवस्था की विफलता अधिक प्रतीत होती है।
ग्राम चीरा में अवैध शराब के खिलाफ हुई ताजा कार्रवाई पर विभाग भले ही अपनी पीठ थपथपा सकता है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि जिस गांव में वर्षों से अवैध शराब बन रही हो और आज भी हजारों किलो लहन बरामद हो रहा हो, वहां सफलता के दावों की बजाय आत्ममंथन की जरूरत है।
यदि हर दो-तीन महीने में एक ही स्थान पर छापेमारी करनी पड़ रही है तो इसका सीधा अर्थ है कि समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। कार्रवाई के बाद जारी होने वाले प्रेस नोट भले ही उपलब्धि दर्शाते हों, लेकिन वे यह भी बताते हैं कि विभाग अब तक स्थायी समाधान खोजने में सफल नहीं हुआ है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि अवैध शराब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। जब तक प्रभावित परिवारों के लिए रोजगार और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था नहीं होगी, तब तक छापेमारी और गिरफ्तारियों का यह सिलसिला चलता रहेगा।
वास्तविक उपलब्धि तब होगी जब चीरा का नाम अवैध शराब के लिए नहीं, बल्कि सफल पुनर्वास और सामाजिक परिवर्तन के मॉडल के रूप में लिया जाएगा। अभी तक की स्थिति में कार्रवाई तो दिख रही है, लेकिन समाधान नहीं।




