लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई। कुछ कहानियां कागजों पर नहीं, पथरीली पगडंडियों और टूटी चौखटों पर लिखी जाती हैं। वे कहानियां पद या प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि आंसू, पसीने और बेबसी से उठकर खुद को साबित करने वाले उस जज्बे की इबारत होती हैं, जो इंसान को टूटने नहीं देता।शाहाबाद क्षेत्र के गुजीदेई गांव की सोंधी माटी से उपजी ऐसी ही एक प्रतिभा, एक संघर्ष और एक जीती-जागती मिसाल की कहानी है—सौरभ मिश्रा नीरज।
पिता की छांव छूटी तो मां की तपस्या बनी ढाल: ढिबरी की रोशनी से तय हुआ संघर्ष का सफर
बचपन अभी ठीक से मुस्कुराना सीख भी न पाया था कि सिर से पिता की ममतामयी छांव हमेशा के लिए उठ गई। वो उम्र, जिसमें बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं, उस उम्र में नीरज की नन्हीं हथेलियों पर दुखों का भारी पहाड़ आ गिरा। घर की छत रही, पर सहारा चला गया।
पर कहते हैं न कि जहां गम का गहरा अंधेरा होता है, वहीं अपनों की मोहब्बत का दीया सबसे तेज जलता है। पिता की जगह बाबा खड़े हो गए—जिन्होंने एक सख्त शिक्षक की तरह नीरज का हाथ थामा और अनुशासन के साथ सही राह दिखाई। दादी के कांपते हाथों की दुलार ने पिता की कमी से खाली हुए नन्हें दिल को सहलाया, ताकि उसमें उदासी का जहर न घुलने पाए।
लेकिन इस पूरी दास्तान की सबसे मार्मिक तस्वीर वो मां थी… आंगनबाड़ी कार्यकत्री की वो मामूली सी नौकरी, और चंद रुपयों का मानदेय। जरा सोचिए, उन चंद रुपयों में तीन-तीन मासूमों का पेट पालना, उनके तन को ढंकना और उनकी पढ़ाई का खर्च उठाना! दिनभर गांव-गांव भटककर शरीर चूर हो जाता, आंखें थक जातीं, पर जब रात ढलती, तो वो मां अपने आंसुओं को पीकर बच्चों के लिए मुस्कुरा देती।घर में बिजली का तार तक नहीं था। रात के गहरे सन्नाटे में जब गांव सो जाता, तब उस घर में ढिबरी की मद्धिम लौ जलती। एक तरफ किताबों पर ढिबरी का धुआं बैठता, और दूसरी तरफ खामोशी से मां की आंखों से टपकता एक कतरा आंसू… जो बस यही प्रार्थना करता था कि “हे ईश्वर! मेरे बच्चों की तकदीर का अंधेरा मिटा दे।” नीरज ने सुविधाओं में सांस नहीं ली, उन्होंने अपनी मां के त्याग और संघर्षों की पवित्र छांव में जीवन जीना सीखा।
वर्दी से लेकर संघ के सेवा पथ तक: संघर्षों से तराशा गया जन-सरोकार
अभाव बहुत थे, लेकिन संस्कार इतने अमीर थे कि कोई कठिनाई नीरज को झुका न सकी। शाहजहांपुर के स्वामी शुकदेवानंद महाविद्यालय (मुमुक्षु आश्रम) से पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सीने में देशप्रेम का जज्बा जागा और वे सेना में भर्ती हो गए। हालांकि, नियति को उन्हें समाज के हर उस लाचार और पीड़ित व्यक्ति के करीब लाना था जो कभी उनके परिवार जैसा संघर्ष कर रहा था; लिहाजा उन्होंने कुछ समय बाद सेना की नौकरी छोड़ दी।
सन 2004 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े। नंगे पांव गांव-गांव घूमना, लोगों के दुख-दर्द बांटना और सांगठनिक जड़ों को मजबूत करना ही उनके जीवन का ध्येय बन गया। इसके बाद:
2007: भारतीय जनता पार्टी में औपचारिक प्रवेश और जिला कार्यसमिति में भूमिका।
2009: शाहाबाद में संगठन के विस्तार की जिम्मेदारी।
आगे का सफर: झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के संयोजक के रूप में गरीबों की आवाज बनना और फिर जिला मंत्री का दायित्व।
2018 व 2019: लगातार दो बार हरदोई भाजपा के जिलाध्यक्ष के रूप में संगठन को नई ऊंचाइयों पर ले जाना।
वर्तमान: लखनऊ जिले के संगठन प्रभारी का दायित्व।
पद की ऊंचाई के बीच भी अक्षुण्ण रही सादगी और निश्छल आत्मीयता
जब वे हरदोई के जिलाध्यक्ष बने, तो उनके कार्यकाल में भाजपा ने जिले की सभी आठों विधानसभा और दोनों लोकसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। पर इस बड़ी राजनीतिक कामयाबी के बावजूद, नीरज का मन वही गुजीदेई का सीधा-साधा बालक ही रहा।
आज के दौर में जहां राजनीति पद और दौलत की चमक-दमक से पहचानी जाती है, वहीं सौरभ मिश्रा नीरज की सादगी ऐसी है कि समर्थकों के अनुसार उनका अपना कोई बैंक खाता तक नहीं है। वे आज भी कार्यकर्ताओं के कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं—
“कार्यकर्ताओं का सम्मान मेरी सांसों की तरह है। अगर कभी देखो कि मैं भटक रहा हूं या गलत रास्ते पर जा रहा हूं, तो बिना झिझक मेरा कान पकड़कर मुझे सचेत कर देना।”
शाहाबाद के जन-मन में गहराता विश्वास और नई उम्मीदों का अंकुरण
आज जब भाजपा ने उन्हें लखनऊ जैसे बड़े जिले का संगठन प्रभारी बनाया है, तो उनकी काबिलियत का दायरा और बढ़ गया है। इसी के साथ 155 शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र में हर उस आम इंसान के दिल में एक उम्मीद जागी है जो अभावों से लड़ रहा है। हर कोई दबी जुबान में उनके नाम की चर्चा कर रहा है। समर्थकों को लगता है कि जिन्होंने गरीबी की मार झेली है, वही उनके दर्द को समझ सकता है। हालांकि, भावी प्रत्याशी कौन होगा, यह पार्टी का नेतृत्व तय करेगा, लेकिन लोगों का प्यार उनके साथ है।
यह मात्र एक राजनीतिक यात्रा नहीं, एक मां की आंसुओं भरी तपस्या का प्रतिफल है
सौरभ मिश्रा नीरज को सिर्फ एक नेता या पदाधिकारी के रूप में देखना उनके उस पावन अतीत के साथ अन्याय होगा।यह कहानी उस बेटे की है जिसने अपनी मां के फटे आंचल को देखा है। यह कहानी उस पोते की है जिसने शिक्षक बाबा के अनुशासन में खुद को तपाया है और दादी की ममतामयी लोरियों में अपने दुखों को भुलाया है।कल राजनीति किस मोड़ पर जाएगी, पार्टी क्या फैसला करेगी और वक्त क्या लिखेगा—यह भविष्य के गर्त में है। लेकिन गुजीदेई की माटी आज भी अपने इस लाल पर फक्र करती है। ढिबरी की उस मद्धिम रोशनी में मां की आंखों से जो आंसू टपके थे, आज सौरभ मिश्रा नीरज की यह सादगी और निष्ठा उन आंसुओं का सबसे पवित्र जवाब बनकर निखर रही है।




