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शाहाबाद क्षेत्र मे ​पकी फसल पर बारिश की मार, अब गर्रा का वार; बाढ़ आई तो पानी में बह जाएगी किसानों की आखिरी उम्मीद

​लक्ष्मीकान्त पाठक

​हरदोई (वेब वार्ता) खेतों में धान की बालियां पककर सुनहरी हो चुकी थीं। किसान कटाई की तैयारी में था और उसकी आंखों में फसल के साथ घर लौटने वाले सुख के छोटे-छोटे सपने पल रहे थे। लेकिन दो दिन पहले हुई भयंकर बारिश ने उन सपनों को खेत में ही पटक दिया। तेज बारिश और हवा से तैयार फसलें जमीन पर गिरकर पानी में गोते खा रही हैं। अब सामने गर्रा नदी का बढ़ता पानी है और किसानों की बची-खुची उम्मीद भी डगमगाने लगी है।
​शाहाबाद तहसील क्षेत्र के कालागाड़ा, उमरिया धानी, उमरियाकैथानी, सुहागपुर, झोथूपुर, नेवादा, किलकिली, बारी, गनुआपुर, सिंगुलापुर, गुजीदेई, परेली, पहाड़पुर कहारकोला, गोपालपुर, दरियापुर बलभद्र, अतर्जी, गुटकाऊ, बैजूपुर, खनुआपुर, शंकरपुर, नस्योली डामर समेत तटवर्ती गांवों में किसान गर्रा नदी के जलस्तर को लेकर गहरी चिंता में हैं।
​बारिश ने फसल को जमीन पर बिछा दिया है। ग्रामीणों का डर है कि अब अगर गर्रा का पानी खेतों में उतरा तो किसान की बची-खुची आस भी डूब जाएगी।
​यह सिर्फ धान की फसल नहीं है। इसी फसल में किसी किसान की बेटी की शादी अटकी है, किसी के बच्चे की स्कूल फीस है, किसी का सिर चढ़ा कर्ज है तो किसी के घर का राशन। फसल बर्बाद होती है तो उसके साथ पूरे परिवार की कई महीनों की उम्मीदें बिखर जाती हैं।

​सर्वे के नाम पर खानापूरी: सवालों के घेरे में राजस्व कर्मियों की कार्यशैली

​एक तरफ कुदरत की मार से किसान टूट चुका है, तो दूसरी तरफ प्रशासन के रवैये ने उसकी चिंताओं को और गहरा कर दिया है। सरकार की ओर से नुकसान का आकलन करने के लिए तहसील के राजस्व कर्मियों को गांवों में तो भेजा जा रहा है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ कागजी खानापूरी बनकर रह गई है।​ग्रामीणों का कहना है कि नुकसान का जायजा लेने पहुंचे राजस्व कर्मी खेतों में उतरने की जहमत तक नहीं उठा रहे। कोई मुख्य सड़क पर गाड़ी खड़ी करके दूर से ही अंदाजा लगा रहा है, तो कोई गांव के प्रधान या रसूखदारों के दरवाजे पर बैठकर चाय की चुस्की के साथ आकलन रिपोर्ट तैयार कर रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जो कर्मचारी किसान के खेत की माटी पर कदम ही नहीं रख रहे, वे बंद कमरों और सड़क किनारे से तबाही का सही पैमाना कैसे तय करेंगे?​किसान की मांग साफ है—उसके नुकसान का हिसाब कागजी पन्नों या प्रधान की बैठक से नहीं, बल्कि खेत के बीच उतरकर लिखा जाए।

​नेताओं की चुप्पी और बांधों की अनदेखी

​सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिस किसान की आंखों से अपने खेत की बर्बादी देखकर आंसू निकल रहे हैं, उन्हें पोंछने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। चुनाव के मौसम में किसान के दरवाजे तक बार-बार पहुंचने वाले खद्दरधारी नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर भी ग्रामीणों के मन में कड़वे सवाल तैर रहे हैं। किसानों का पूछना है कि वोट मांगते समय हाथ जोड़ने वाले लोग संकट की इस घड़ी में उनके बीच क्यों नहीं दिखाई दे रहे? उनका दर्द सुनने और प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंचाने की जरूरत आज है, चुनाव के समय नहीं।

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​ग्रामीणों की एक चिंता यह भी है कि गर्रा नदी के तटवर्ती इलाकों में जहां-जहां से पानी फैलता है, वहां अगर समय रहते आवश्यक सुरक्षा एवं बंधान की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाता, तो कई गांवों में बाढ़ के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता था। अब जब नदी का पानी सिर पर आ खड़ा हुआ है, तब सवाल उठ रहा है कि इन कमजोर बिंदुओं को मजबूत करने की सुध कब ली जाएगी?
​आज गर्रा नदी के किनारे खड़ा किसान आसमान, नदी और प्रशासन—तीनों की ओर बेबसी से देख रहा है। उसके हाथ में न कोई राजनीतिक ताकत है, न कोई दूसरा सहारा। उसके पास सिर्फ वह खेत है, जिसमें उसकी साल भर की मेहनत खड़ी थी।​पकी फसल पर बारिश की मार पड़ चुकी है। अब अगर गर्रा का वार हुआ, तो खेतों में सिर्फ पानी नहीं बहेगा—किसान का पसीना, घर की रोटी और आने वाले कल की आखिरी उम्मीद भी बह जाएगी।

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