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ट्रंप ने मुस्लिम देशों से इजरायल संबंधों की अपील की, जानें क्या है अब्राहम समझौता

वाशिंगटन, 27 मई (वेब वार्ता)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक नई अपील ने पश्चिम एशिया की राजनीति में फिर हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने कई मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने और अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया है। इस बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर अब्राहम समझौता क्या है और इसका क्षेत्रीय राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ सकता है।

ट्रंप ने 25 मई को अपने सामाजिक माध्यम मंच पर पोस्ट साझा करते हुए सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के नेताओं से इजरायल के साथ रिश्ते मजबूत करने की अपील की। उन्होंने इसे अनिवार्य अनुरोध बताते हुए कहा कि जो देश इस दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे, उन्हें संभावित ईरान समझौते का हिस्सा नहीं होना चाहिए। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है।

रिपोर्टों के अनुसार, इस पोस्ट से पहले ट्रंप ने इन देशों के नेताओं के साथ एक संवाद भी किया था। चर्चा के दौरान जब इजरायल को मान्यता देने और संबंध सामान्य करने की बात उठी, तो कई देशों की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आई और माहौल कुछ समय के लिए शांत हो गया। यही घटनाक्रम अब्राहम समझौते को फिर से वैश्विक चर्चा के केंद्र में ले आया है।

अब्राहम समझौता कोई एक दस्तावेज नहीं, बल्कि कई समझौतों की श्रृंखला है। इसके माध्यम से अरब और मुस्लिम देश इजरायल के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध सामान्य करते हैं। यह पहल अमेरिका की मध्यस्थता में शुरू हुई और ट्रंप के पहले कार्यकाल की प्रमुख विदेश नीति उपलब्धियों में गिनी जाती है।

इस समझौते का नाम हजरत इब्राहिम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें इस्लाम, ईसाई और यहूदी तीनों धर्मों में सम्मानित स्थान प्राप्त है। इसका उद्देश्य क्षेत्र में संवाद, सहयोग और संबंधों को नई दिशा देना बताया गया। हालांकि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसने दशकों पुराने उस अरब रुख को चुनौती दी, जिसके तहत फिलिस्तीन राज्य की स्थापना से पहले इजरायल को मान्यता नहीं देने की नीति अपनाई जाती थी।

15 सितंबर को वाशिंगटन में व्हाइट हाउस परिसर में इस समझौते की औपचारिक शुरुआत हुई, जब इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के प्रतिनिधियों ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को, सूडान और अन्य देशों ने भी इसमें भागीदारी दिखाई। मिस्र और जॉर्डन पहले ही अलग शांति समझौतों के जरिए इजरायल से संबंध स्थापित कर चुके थे।

अब्राहम समझौते के बाद इजरायल और खाड़ी देशों के बीच संबंधों में उल्लेखनीय बदलाव देखा गया। व्यापार, पर्यटन और हवाई संपर्क तेजी से बढ़े। संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच कारोबारी संबंधों में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों तथा निवेश के नए रास्ते खुले।

हालांकि इस समझौते को लेकर आलोचनाएं भी कम नहीं हैं। फिलिस्तीनी नेतृत्व और कई पश्चिम एशियाई विश्लेषकों का कहना है कि यह पहल इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के मूल प्रश्न को नजरअंदाज करती है। उनका आरोप है कि समझौता क्षेत्रीय आर्थिक और कूटनीतिक हितों पर केंद्रित है, जबकि फिलिस्तीन मुद्दे का स्थायी समाधान अभी भी दूर है।

अक्टूबर 2023 के बाद गाजा संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव ने इन समझौतों की मजबूती की परीक्षा ली, लेकिन इसके बावजूद कोई सदस्य देश अब तक इससे पीछे नहीं हटा है। यही कारण है कि ट्रंप अब इसे और व्यापक बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।

ट्रंप की नई अपील पर अलग-अलग देशों की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को लेकर दूरी बनाई है और संकेत दिया है कि वह इसे अपनी नीति से जुड़ा विषय मानता है। वहीं सऊदी अरब के लिए यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि उसका पुराना रुख फिलिस्तीन राज्य के स्पष्ट समाधान से जुड़ा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस पहल को अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन जमीनी वास्तविकता यह है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, गाजा युद्ध और मुस्लिम देशों के भीतर जनभावनाएं इस राह की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अब्राहम समझौता वास्तव में नए देशों तक विस्तार पा सकेगा या क्षेत्रीय जटिलताएं इसकी रफ्तार को सीमित कर देंगी।

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