नई दिल्ली | अंतरराष्ट्रीय डेस्क | वेब वार्ता
Dr Mahrang Baloch, जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ लंबे समय से आवाज़ उठाती रही हैं, उन्हें एक आतंकवाद निरोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें उनके सहयोगी सिबग़तुल्लाह शाह के साथ वर्ष 2024 में ग्वादर में हुए एक प्रदर्शन के दौरान अर्द्धसैनिक बल के जवान की हत्या, हिंसा भड़काने और चरमपंथ से जुड़े आरोपों में दोषी ठहराया है। हालांकि महरंग बलोच और उनके समर्थकों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए मुकदमे की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस फैसले के बाद पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संगठनों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
- डॉ. महरंग बलोच को पाकिस्तान की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई।
- साथी कार्यकर्ता सिबग़तुल्लाह शाह भी दोषी करार दिए गए।
- मामला 2024 में ग्वादर में हुए प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाकर्मी की मौत से जुड़ा है।
- महरंग बलोच ने आरोपों को खारिज करते हुए मुकदमे का बहिष्कार किया था।
- मानवाधिकार संगठनों ने फैसले की आलोचना की है।
- पाकिस्तान सरकार का दावा है कि अभियोजन पक्ष के पास पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
Dr Mahrang Baloch कौन हैं?
डॉ. महरंग बलोच बलूचिस्तान की चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता और बलोच यकजेती कमेटी (BYC) की प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। वह कई वर्षों से बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी, गैर-न्यायिक हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों को प्रमुखता से उठाती रही हैं।
साल 2009 में उनके पिता के कथित अपहरण और बाद में यातना के निशानों के साथ शव मिलने के बाद उन्होंने मानवाधिकार आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। वर्ष 2023 में उन्होंने सैकड़ों महिलाओं के साथ लगभग 1,600 किलोमीटर लंबा मार्च कर इस्लामाबाद तक यात्रा की थी, जिसमें लापता लोगों को न्याय दिलाने की मांग उठाई गई थी।
मामले की प्रमुख घटनाएं
| घटना | विवरण |
|---|---|
| मुख्य आरोपी | डॉ. महरंग बलोच एवं सिबग़तुल्लाह शाह |
| मामला | 2024 ग्वादर प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाकर्मी की हत्या |
| अदालत | क्वेटा आतंकवाद निरोधी अदालत |
| सजा | उम्रकैद एवं 2 लाख पाकिस्तानी रुपये का जुर्माना |
| बचाव पक्ष का रुख | आरोपों से इनकार, मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल |
फैसले पर क्यों उठे सवाल?
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP), इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन (IHRF) और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि मुकदमे की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और बचाव पक्ष को पर्याप्त कानूनी अवसर नहीं दिया गया।
स्वीडिश पर्यावरण एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया। वहीं बलूचिस्तान सरकार का कहना है कि अभियोजन पक्ष के पास पर्याप्त और मजबूत साक्ष्य मौजूद थे तथा यह मामला राजनीतिक कारणों से प्रेरित नहीं है।
मानवाधिकार और सुरक्षा के बीच बहस जारी
डॉ. महरंग बलोच का मामला पाकिस्तान में सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियानों और मानवाधिकारों के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस का प्रमुख विषय बन गया है। एक ओर सरकार इसे कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बता रही है, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकार संगठन इसे नागरिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया से जोड़कर देख रहे हैं।
आगे आने वाले समय में इस मामले पर उच्च न्यायालयों, मानवाधिकार संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।




