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त्योहार तो अमीरों के होते हैं, गरीब तो चूल्हा जलाने के लिए जद्दोजहद करता है

लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई (वेबवार्ता)।
दीपावली दस्तक दे रही है। नगर के बाजार रोशनी से नहा उठे हैं। दुकानों पर रंग-बिरंगी झालरों की चमक है, मिठाइयों की दुकानों से उठती सुगंध वातावरण में उत्सव का आभास घोल रही है। कहीं नए वस्त्रों की खरीदारी है तो कहीं उपहारों की पैकिंग। घरों की देहरी सज रही है, आंगनों में रंगोली के रंग उतरने लगे हैं। लगता है, जैसे समूची सृष्टि अंधकार को विदा कर उजास का स्वागत करने को आतुर हो।
लेकिन इसी उत्सवी कोलाहल से दूर गांव की किसी कच्ची दीवारों वाली झोपड़ी में एक अलग ही सन्नाटा पसरा है। वहां दीपावली की आहट उल्लास नहीं, बल्कि हिसाब-किताब की चिंता लेकर आई है। बच्चे पटाखों और नए कपड़ों की फरमाइश कर रहे हैं, मां उनकी इच्छाओं को सुनकर चुप हो जाती है और पिता अपनी खाली जेब में हाथ डालकर जैसे पूरे वर्ष की विवशताओं को टटोलने लगता है।वह बच्चों के सामने मुस्कुराता है, उन्हें बहलाता है और कहता है—”इस बार नहीं, अगली बार जरूर दिलाएंगे।” मगर उसके भीतर एक ऐसा मौन पसरा होता है, जिसमें एक पिता की बेबसी, एक किसान की पराजित उम्मीदें और एक मजदूर की अनकही पीड़ा एक साथ सिसक रही होती हैं।
कितनी विचित्र विडंबना है कि जिस पर्व का संदेश अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना है, उसी पर्व की देहरी पर समाज का एक बड़ा वर्ग अभावों के अंधकार से जूझ रहा है।

महंगाई ने छीन ली त्योहार की मिठास

इस बार महंगाई ने दीपावली के उल्लास पर अपनी कठोर छाया डाल दी है। बीते वर्ष की तुलना में खाद्य पदार्थों के दामों में हुई बढ़ोतरी ने आम आदमी की गृहस्थी का गणित बिगाड़ दिया है। घी और डालडा करीब 20 रुपये प्रति किलो महंगे हुए हैं, तो चीनी के भाव में भी लगभग 20 रुपये प्रति किलो का इजाफा हुआ है। अरहर की दाल करीब 50 रुपये किलो तक महंगी हो गई है। उड़द और मसूर जैसी दालों के दामों में भी लगभग 35 रुपये प्रति किलो की वृद्धि है। प्याज के भाव करीब 50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुने हैं। टमाटर भी करीब 40 रुपये किलो बिक रहा है।इन बढ़ी हुई कीमतों का असर केवल बाजार की दुकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि गरीब की रसोई में पकने वाली हर रोटी के साथ महसूस किया जा रहा है। पिछले वर्ष जिस परिवार ने एक हजार रुपये में मिठाई, पूजन सामग्री, कुछ आवश्यक सामान और बच्चों के लिए पटाखे खरीदकर दीपावली मना ली थी, उसे इस बार वही जरूरतें पूरी करने के लिए डेढ़ हजार रुपये से अधिक खर्च करने पड़ रहे हैं। त्योहार का बजट लगभग पचास प्रतिशत तक बढ़ गया है, जबकि आमदनी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई; बल्कि अनेक परिवारों की आय तो पहले की अपेक्षा और सिमट गई है।
महंगाई का सबसे क्रूर चेहरा उस मां की विवशता में दिखाई देता है, जो दीपावली पर अपने बच्चों को मिठाई खिलाने का स्वप्न तो देखती है, लेकिन दुकान पर कीमत पूछने के बाद खाली हाथ लौट आती है। घर पहुंचकर बच्चों से कहती है कि “मिठाई पूजा के बाद मिलेगी।” बच्चे उसकी बात पर सहज विश्वास कर लेते हैं। उन्हें क्या पता कि मां की झोली में मिठाई नहीं, केवल अधूरी इच्छाओं का बोझ है।बाजार में छह सौ रुपये किलो बिकने वाली मिठाई किसी संपन्न परिवार के लिए सामान्य खरीदारी हो सकती है, लेकिन दिहाड़ी मजदूर के लिए वह कई दिनों की कमाई और घर के राशन के बीच खड़ा एक कठिन चुनाव है।

खेतों में केवल फसल नहीं, किसान के सपने भी उजड़े

हरदोई की धरती का मिजाज खेती-किसानी से पहचाना जाता है। यहां गांवों की सुबह खेतों की मेड़ों से शुरू होती है और किसान की उम्मीदें फसल के साथ आकार लेती हैं। किसान जब धरती की छाती चीरकर बीज बोता है, तो उसके साथ अपनी संतानों के भविष्य के सपने भी रोपता है। उसकी आंखों में फसल की हरियाली के साथ बेटी की जरूरतें पूरी करने, बेटे की पढ़ाई का खर्च जुटाने और त्योहार पर घर में थोड़ी मिठास घोलने की आकांक्षाएं भी अंकुरित होती हैं।लेकिन इस बार मौसम की बेरुखी ने उसकी तमाम उम्मीदों को झकझोर दिया। बारिश की मार से फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। कहीं खेतों में खड़ी फसल डूब गई, तो कहीं तैयार उपज की गुणवत्ता बिगड़ गई। जिस धरती से किसान को समृद्धि की आशा थी, उसी धरती ने इस बार उसकी आंखों में चिंता के बादल भर दिए।पीड़ा केवल फसल के नुकसान तक सीमित नहीं है। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। खाद, बीज, डीजल, कीटनाशक और मजदूरी के खर्च ने पहले ही किसान की कमर झुका रखी है। इसके बावजूद जब वह अपनी उपज लेकर बाजार पहुंचता है, तो उसे कई बार मेहनत के अनुरूप मूल्य नहीं मिल पाता। खेत में उसकी मेहनत का मोल आसमान छूती लागत के सामने कहीं खो जाता है।उस किसान की मनोदशा की कल्पना कीजिए, जिसने पूरे वर्ष इस उम्मीद में परिश्रम किया कि दीपावली पर बच्चों को नए कपड़े पहनाएगा, घर में मिठाई आएगी और आंगन में कुछ दीये अधिक जलेंगे। लेकिन जब फसल ने ही साथ छोड़ दिया, तो उसके सपनों की गठरी भी अधूरी रह गई।वह बच्चों को अपनी आर्थिक विवशता समझाए भी तो कैसे? बच्चों के लिए तो दीपावली नए कपड़ों, मिठाइयों और पटाखों का नाम है। उन्हें क्या मालूम कि पिता की आंखों में इस बार खेतों की हरियाली नहीं, कर्ज और नुकसान के आंकड़े तैर रहे हैं।

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच खड़ा गरीब

गरीबों के कल्याण, किसानों की आय में वृद्धि और आम आदमी को महंगाई से राहत देने के लिए केंद्र एवं प्रदेश सरकारें अनेक योजनाओं का उल्लेख करती रही हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत करोड़ों लाभार्थियों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से पात्र किसानों के खातों में आर्थिक सहायता पहुंचाई जाती है। फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य और आपदा राहत जैसी व्यवस्थाएं भी किसानों के संरक्षण के लिए मौजूद हैं।
इन योजनाओं का अपना महत्व है, लेकिन सरकारी दावों की वास्तविक सफलता का आकलन उस परिवार की जिंदगी से होना चाहिए, जिसकी थाली में अनाज तो पहुंचा है, मगर दाल, तेल और सब्जी खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं।मुफ्त राशन पेट की आग बुझाने में सहारा बन सकता है, लेकिन उससे बच्चों की फीस, दवाइयों का खर्च, कपड़े, बिजली का बिल और त्योहार की छोटी-छोटी खुशियां नहीं खरीदी जा सकतीं। किसान के खाते में सम्मान निधि की राशि पहुंचना राहत अवश्य है, लेकिन प्राकृतिक आपदा से क्षतिग्रस्त फसल और बढ़ती खेती की लागत के सामने उसकी पर्याप्तता का सवाल भी अपनी जगह है।जरूरत केवल योजनाओं की घोषणा करने की नहीं, बल्कि उनके लाभ को जरूरतमंदों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की है। फसल नुकसान का समयबद्ध आकलन, उचित मुआवजा, उपज का लाभकारी मूल्य, रोजगार की उपलब्धता और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण ही गरीब के जीवन में वास्तविक राहत ला सकते हैं।आखिर विकास की चमक का अर्थ तभी है, जब उसकी रोशनी समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की चौखट तक पहुंचे।

पटाखों की दुकान पर ठहर गई एक मासूम इच्छा

दीपावली का सबसे निष्कलुष उल्लास बच्चों की आंखों में दिखाई देता है। उनके लिए यह पर्व रंगों, मिठाइयों, नए कपड़ों और पटाखों का संसार है। लेकिन अभाव की दुनिया में पलने वाले बच्चों के सपने भी अक्सर उनकी हैसियत देखकर आकार लेने लगते हैं।
कल्पना कीजिए, एक मजदूर पिता अपने छोटे बच्चे का हाथ थामे बाजार से गुजर रहा है। पटाखों की दुकान पर सजी रंगीन डिब्बियां देखकर बच्चा ठिठक जाता है। उसकी आंखों में कौतूहल चमक उठता है। वह पिता का हाथ खींचकर कहता है—”पापा, मुझे भी पटाखे चाहिए।”
पिता दुकान पर पहुंचता है, कीमत पूछता है, कुछ क्षण तक पटाखों को देखता रहता है और फिर अनायास अपनी जेब टटोलता है। जेब में रखे चंद नोटों और घर की जरूरतों के बीच एक मौन संघर्ष शुरू हो जाता है। आखिरकार वह बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है।
बच्चा कुछ दूर तक पीछे मुड़कर दुकान को देखता रहता है। पिता के कदम आगे बढ़ते हैं, लेकिन उसकी आंखें शायद वहीं ठहर जाती हैं।
घर पहुंचकर बच्चा मां से पूछता है—”मां, इस बार दीपावली पर पटाखे नहीं आएंगे?”
मां के पास कोई उत्तर नहीं होता। वह बच्चे को अपने सीने से लगा लेती है। शायद उसकी आंखों की नमी ही उस प्रश्न का उत्तर बन जाती है।
गरीबी केवल खाली जेब का नाम नहीं है। गरीबी वह पीड़ा भी है, जब माता-पिता अपने बच्चों की मासूम इच्छाओं के सामने स्वयं को असहाय पाते हैं। जब वे अपनी संतानों की मुस्कान खरीदने की सामर्थ्य नहीं रखते और रात के अंधेरे में अपनी विवशताओं के साथ चुपचाप आंसू पी जाते हैं।

एक ओर रोशनी के महल, दूसरी ओर उम्मीद का अकेला दीया

दीपावली की रात किसी आलीशान भवन में सैकड़ों दीप प्रज्वलित होंगे। बिजली की झालरें दीवारों को आभा से भर देंगी। मिठाइयों के थाल सजेंगे, मेहमान आएंगे और उपहारों का आदान-प्रदान होगा।उसी रात किसी गांव के कच्चे मकान में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया जलेगा। संभव है, उसमें तेल भी नापकर डाला गया हो। मां बच्चों को थोड़ी-सी मिठाई बांटकर स्वयं उनकी तृप्त मुस्कान में अपनी खुशी तलाश लेगी। पिता अगले दिन फिर मजदूरी की तलाश में निकलने की चिंता लिए चुपचाप सो जाएगा।
उस घर में दीपावली तो आएगी, लेकिन उल्लास शायद चौखट पर ही ठिठक जाएगा।
विडंबना देखिए, जो किसान पूरे समाज का पेट भरता है, कई बार उसी के घर में त्योहार पर पकवान बनाने की गुंजाइश नहीं होती। जो मजदूर दूसरों के घरों को सजाता है, उसके अपने घर की दीवारें बदरंग रह जाती हैं। जो हाथ दूसरों के लिए मिठाइयां तैयार करते हैं, उन्हीं हाथों के बच्चों को कभी मिठाई के लिए तरसना पड़ता है।
यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है, जहां दूसरों के घरों में उजाला पहुंचाने वाले हाथों की अपनी देहरी अंधेरे से जूझती है?

दीपावली की सार्थकता गरीब की मुस्कान में है

दीपावली केवल धन-वैभव के प्रदर्शन का पर्व नहीं है। यह संवेदना, करुणा, सद्भाव और साझी खुशियों का उत्सव है। इसका वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी इस उल्लास में अपनी हिस्सेदारी महसूस कर सके।किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, प्राकृतिक आपदा में हुए नुकसान की भरपाई समय पर हो, मजदूरों को सम्मानजनक पारिश्रमिक और पर्याप्त रोजगार मिले तथा महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण हो। सरकार की योजनाओं का लाभ कागजों से निकलकर जरूरतमंद की जिंदगी में दिखाई दे। समाज भी उन परिवारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता बनाए रखे, जिनके लिए त्योहार मनाना आज भी एक आर्थिक चुनौती है।क्योंकि किसी गरीब की झोपड़ी में जलने वाला एक छोटा-सा मिट्टी का दीपक भी उतना ही पवित्र है, जितनी किसी महल में जगमगाती हजारों रोशनियां।
और अंत में… एक सवाल, जो मन को विचलित कर देता है
जब दीपावली की रात आसमान आतिशबाजी से भर जाएगा, जब मिठाइयों के थाल सजेंगे और लोग एक-दूसरे को मंगलकामनाएं देंगे, तब क्या किसी को उस किसान की याद आएगी, जिसकी फसल बारिश की भेंट चढ़ गई?क्या किसी को उस मजदूर पिता का ध्यान आएगा, जिसने अपने बच्चे से पटाखे दिलाने का वादा तो किया, लेकिन खाली जेब के कारण उसे पूरा नहीं कर सका?क्या कोई उस मां की खामोशी पढ़ पाएगा, जिसने बच्चों को मिठाई खिलाने की इच्छा में अपनी ही छोटी-सी जरूरत को फिर टाल दिया?
शायद नहीं। क्योंकि जगमगाते बाजारों का शोर अक्सर अभावों में पलती जिंदगियों की सिसकियों को दबा देता है।लेकिन सच यही है कि दीपावली की असली रोशनी महंगे झूमरों, बिजली की झालरों और आतिशबाजी में नहीं, बल्कि उस मुस्कान में है, जो किसी जरूरतमंद के चेहरे पर लौट आए।जिस घर में बच्चे भूखे पेट सोते हों, वहां दीपों की कतार भी मन का अंधेरा नहीं मिटा सकती। जिस पिता की जेब बच्चों की छोटी-सी इच्छा पूरी न कर सके, उसके लिए त्योहार भी कभी-कभी एक खामोश सजा बन जाता है। ऐसे यह स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि त्योहार तो अमीरों के होते हैं, गरीब तो आज भी चूल्हा जलाने के लिए मेहनत करता है। उसकी दीपावली उस दिन होगी, जब उसके बच्चों की आंखों में अधूरी ख्वाहिशों के बजाय संतोष की चमक होगी, उसकी थाली में भरपेट भोजन होगा और उसे अपने परिवार की खुशियों के लिए अपनी मजबूरियों से समझौता नहीं करना पड़ेगा।क्योंकि किसी राष्ट्र की समृद्धि का वास्तविक उजाला उसके महलों की रोशनी से नहीं, बल्कि उसकी सबसे गरीब झोपड़ी में जलते दीए से पहचाना जाता है।

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