तेहरान, 15 जून (वेब वार्ता)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा के बाद तेहरान की ओर से पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने इस समझौते को अपनी रणनीतिक जीत करार देते हुए दावा किया है कि अमेरिका और इजरायल को ईरानी सेना के सामने झुकना पड़ा और उनके पास समझौते के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से जारी बयान में कहा गया कि तेहरान की जनता के समर्थन और ईरानी सेना के अथक प्रयासों के चलते कई महीनों तक चली कठिन और लंबी वार्ताओं के बाद 14 जून की शाम अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को अंतिम रूप दिया गया। परिषद ने कहा कि यह समझौता राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
ईरान ने इस शांति समझौते को ‘समझौता ज्ञापन’ का नाम दिया है। बयान में कहा गया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि दुश्मन देशों पर भरोसा किया जाए। ईरान अमेरिका की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखेगा और किसी भी संभावित खतरे के प्रति सतर्क रहेगा।
19 जून को जेनेवा में होंगे हस्ताक्षर
ईरानी सूत्रों के अनुसार, इस समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे। ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस प्रक्रिया में शामिल होंगे, जबकि अमेरिका का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे।
बताया जा रहा है कि समझौते के तहत लेबनान सहित विभिन्न मोर्चों पर चल रहे सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त किया जाएगा। इसके अलावा ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकाबंदी को भी तत्काल प्रभाव से हटाने का प्रावधान किया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने किया था समझौते का ऐलान
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सामाजिक मंच पर एक संदेश साझा कर अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा की थी। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए सभी पक्षों को बधाई दी थी। ट्रंप ने कहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी अतिरिक्त कर के पूरी तरह खोलने की अनुमति दी जा रही है और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी भी तत्काल प्रभाव से हटाई जाएगी।
उन्होंने अपने संदेश में यह भी कहा था कि वैश्विक तेल आपूर्ति को सामान्य बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा ऊर्जा बाजारों को राहत मिलने की उम्मीद है।
मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम
यदि यह समझौता तय कार्यक्रम के अनुसार औपचारिक रूप से लागू होता है, तो इसे मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाएगा। लंबे समय से तनाव और टकराव की स्थिति से गुजर रहे क्षेत्र में इससे स्थिरता आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, ईरान की ओर से अमेरिका पर भरोसा न करने और सतर्क रहने की बात यह भी संकेत देती है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
फिलहाल दुनिया की निगाहें 19 जून को जेनेवा में होने वाले हस्ताक्षर समारोह पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता क्षेत्रीय शांति की दिशा में कितना प्रभावी साबित होता है।




