नई दिल्ली, 20 सितंबर (वेब वार्ता)। रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी कोशिशों के बीच भारत और चीन के लिए व्यापारिक चिंताएं बढ़ गई हैं। प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों संबंधी कानून पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कानून के तहत रूस से बड़े पैमाने पर तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान बताया गया है।
हालांकि, भारत पर ऐसा कोई अतिरिक्त शुल्क अभी लागू नहीं हुआ है। संभावित शुल्क का वास्तविक असर कानून के प्रावधानों, उसके क्रियान्वयन और अमेरिकी प्रशासन के आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।
रूस पर प्रतिबंधों का दायरा बढ़ा
नए कानून का आधिकारिक नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ बताया गया है। इसके तहत रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, रक्षा क्षेत्र से जुड़े नेटवर्क और पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ‘शैडो फ्लीट’ पर प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाया गया है।
‘शैडो फ्लीट’ उन जहाजों के समूह को कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल रूस द्वारा पश्चिमी प्रतिबंधों से बचते हुए तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों के परिवहन के लिए किए जाने का आरोप है। नए कानून का उद्देश्य ऐसे नेटवर्क पर आर्थिक और समुद्री दबाव बढ़ाना है।
भारत और चीन पर कैसे लागू हो सकता है 100 प्रतिशत टैरिफ?
कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इसमें रूस के ऊर्जा उत्पादों के पांच बड़े खरीदार देशों को संभावित रूप से निशाना बनाए जाने की बात कही गई है।
भारत और चीन रूस से कच्चे तेल के बड़े आयातकों में शामिल हैं। इसलिए दोनों देशों के निर्यात को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि, कानून के पारित होने का अर्थ यह नहीं है कि भारत या चीन पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया है। इसके लिए अमेरिकी प्रशासन को आगे अलग से निर्णय लेना होगा।
भारत का क्या है रुख?
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा है कि देश को किफायती और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता है। भारतीय पक्ष ने यह भी संकेत दिया है कि ऐसे प्रतिबंधात्मक कदम भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर डाल सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती यह है कि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने से ऊर्जा आयात की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। वहीं, रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने पर अमेरिकी व्यापारिक प्रतिबंधों का संभावित खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका में कौन-से भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं?
यदि भविष्य में अमेरिका भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है। संभावित प्रभाव का आकलन अभी निश्चित रूप से नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन किन वस्तुओं पर शुल्क लगाता है और उसकी दर कितनी रखी जाती है।
संभावित रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है—
कपड़ा उद्योग: रेडीमेड कपड़े और सूती वस्त्र महंगे हो सकते हैं।
दवा उद्योग: भारतीय जेनेरिक दवाओं और कुछ चिकित्सा उत्पादों के निर्यात पर दबाव पड़ सकता है।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र: ऑटो पार्ट्स और संबंधित उपकरणों की कीमत बढ़ सकती है।
आभूषण उद्योग: कृत्रिम आभूषण और हीरे के आभूषण प्रभावित हो सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद: कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान और स्मार्टफोन की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी भी क्षेत्र पर वास्तविक प्रभाव तभी स्पष्ट होगा, जब अमेरिका शुल्क की दर, उत्पादों का दायरा और लागू करने की समयसीमा घोषित करेगा।
आगे क्या होगा?
नए कानून ने अमेरिकी प्रशासन को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार तो दिया है, लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू नहीं हुआ है। आगे की स्थिति अमेरिकी प्रशासन के फैसलों, भारत की ऊर्जा खरीद नीति और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम में ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।




