नई दिल्ली, 27 मई (वेब वार्ता)। बाजार में खाने के तेल के अलग-अलग पैकेट आकारों से उपभोक्ताओं को होने वाली परेशानी को देखते हुए सरकार नए नियम लाने की तैयारी कर रही है। उपभोक्ता मामलों का विभाग खाने के तेल के पैकेटों के लिए तय मानक आकार निर्धारित करने पर विचार कर रहा है, जिससे ग्राहकों को कीमतों की तुलना करने और उचित खरीद निर्णय लेने में आसानी हो सकेगी।
वर्तमान में बाजार में खाने के तेल के पैकेट 650 ग्राम, 700 ग्राम, 810 ग्राम और 850 ग्राम जैसे विभिन्न आकारों में उपलब्ध हैं। इन असमान आकारों के कारण उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग कंपनियों के उत्पादों की वास्तविक कीमत समझना और तुलना करना कठिन हो जाता है। इसी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से वैधानिक माप-तौल नियमों के तहत नए प्रावधान तैयार किए जा रहे हैं।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, प्रस्तावित नियम लागू होने के बाद खाने के तेल के पैकेट कुछ तय आकारों में उपलब्ध हो सकते हैं। इनमें 200 मिलीलीटर, 500 मिलीलीटर, एक से पांच लीटर, 15 लीटर या किलोग्राम तथा 20 लीटर या 20 किलोग्राम जैसे मानक आकार शामिल किए जाने पर विचार किया जा रहा है। इससे बाजार में एकरूपता आएगी और मूल्य निर्धारण अधिक पारदर्शी बन सकेगा।
इस विषय पर हाल ही में उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें खाने के तेल उद्योग से जुड़े प्रमुख संगठनों ने भाग लिया। बैठक में उद्योग प्रतिनिधियों ने बाजार में बढ़ते विभिन्न पैकेट आकारों को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि असमान पैकेजिंग आकार ग्राहकों में भ्रम पैदा कर रहे हैं।
उद्योग संगठनों का मानना है कि यदि खाने के तेल की प्रमुख किस्मों के लिए समान और मानक पैकेट आकार तय किए जाते हैं, तो उपभोक्ता आसानी से कीमतों की तुलना कर सकेंगे और कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा मिलेगा। इसी आधार पर प्रमुख खाद्य तेलों के लिए मानक पैकेट आकार तय करने पर सहमति बनने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, उद्योग संगठनों ने यह भी सुझाव दिया है कि 200 मिलीलीटर से छोटे पैकेटों को फिलहाल इस प्रस्तावित नियम के दायरे से बाहर रखा जाए। उनका तर्क है कि कम कीमत वाले छोटे पैकेट आम उपभोक्ताओं, विशेषकर सीमित आय वर्ग के लोगों के लिए उपयोगी होते हैं और उनकी उपलब्धता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो खाने के तेल के बाजार में पैकेजिंग व्यवस्था अधिक व्यवस्थित हो सकती है और उपभोक्ताओं को खरीदारी के दौरान स्पष्ट एवं पारदर्शी जानकारी प्राप्त होगी। इससे मूल्य तुलना की प्रक्रिया सरल होने के साथ-साथ उपभोक्ता हितों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।




