नई दिल्ली, 22 अप्रैल (वेब वार्ता)। आयकर चुकाने वाले अधिकांश लोग अपनी आय पर लगने वाले कर को कम करने के उपाय तलाशते रहते हैं। खासकर जब कोई बड़ा खर्च, जैसे कार खरीदना, सामने होता है तो कर भार और भी बढ़ जाता है। ऐसे में कार लीजिंग एक ऐसा विकल्प बनकर उभर रहा है, जिससे न केवल खर्च नियंत्रित होता है बल्कि कर में भी उल्लेखनीय बचत संभव है।
कार लीजिंग का सरल अर्थ है किसी वाहन को खरीदने के बजाय निर्धारित अवधि के लिए किराए पर लेना। इस व्यवस्था में वाहन का स्वामित्व लीज देने वाली कंपनी के पास रहता है, जबकि उपयोगकर्ता मासिक किराया देकर उसका उपयोग करता है। यह व्यवस्था किराए के मकान की तरह होती है, जहां उपयोग का अधिकार तो होता है लेकिन स्वामित्व नहीं।
कर बचत के दृष्टिकोण से कार लीजिंग को उपयोगी माना जाता है। आमतौर पर कंपनियां अपने कर्मचारियों को वेतन संरचना के तहत लीज पर कार उपलब्ध कराती हैं। इस स्थिति में कार की लागत कर्मचारी के सकल वेतन में समायोजित कर दी जाती है, जिससे कर योग्य आय कम हो जाती है।
इसके अतिरिक्त, कर की गणना वास्तविक खर्च के बजाय निर्धारित नियमों के आधार पर की जाती है, जैसे इंजन क्षमता और उपयोग। यह मूल्य अक्सर खरीदी गई कार की कुल लागत से कम होता है, जिससे कर का बोझ घटता है। साथ ही, ईंधन, चालक और रखरखाव जैसे खर्च भी कई मामलों में कंपनी द्वारा वहन किए जाते हैं, जिससे व्यक्तिगत खर्च में भी कमी आती है।
नए कर प्रावधान में भी यह व्यवस्था प्रासंगिक बनी हुई है। नए ढांचे का मुख्य उद्देश्य कर दरों को सरल बनाना है, जहां छूट और कटौतियों की संख्या सीमित रखी गई है। ऐसे में वेतन संरचना को इस प्रकार तैयार करना, जिसमें लीजिंग जैसे विकल्प शामिल हों, कर नियोजन का एक प्रभावी तरीका माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कार लीजिंग उन लोगों के लिए अधिक लाभकारी हो सकती है जो उच्च आय वर्ग में आते हैं और अपनी कर देनदारी को व्यवस्थित ढंग से कम करना चाहते हैं। हालांकि, किसी भी निर्णय से पहले शर्तों और नियमों को भलीभांति समझना आवश्यक है, ताकि दीर्घकाल में इसका पूरा लाभ प्राप्त किया जा सके।



