-सचिन कुमार गौतम
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने न केवल प्रतिनिधि सभा, बल्कि सीनेट पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया है। यह परिणाम ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की नीतियों, उनकी कठोर भाषा और विदेश नीति के विवादों के खिलाफ मतदाताओं की स्पष्ट प्रतिक्रिया माना जा रहा है। डेमोक्रेट्स ने सीनेट में सात सीटें जीतीं और प्रतिनिधि सभा में भी बहुमत हासिल किया, जिससे वे दोनों सदनों पर अपना कब्ज़ा स्थापित करने में सफल रहे।
ये चुनाव ट्रंप के लिए अपने दूसरे कार्यकाल की जनता से होने वाली एक बड़ी परीक्षा थे। उन्होंने “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” के नारे के साथ आर्थिक राष्ट्रवाद, कड़ी आप्रवासन नीति और आक्रामक विदेश नीति को अपनी पहचान बनाया। नई टैरिफ नीति का असर भारत समेत कई देशों पर पड़ा, जिससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ी। वीज़ा, नागरिकता और अमेरिका में काम करने के नियमों को सख्त करने के फैसलों ने लाखों प्रवासियों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों-कर्मचारियों को चिंता में डाल दिया।
विदेश नीति के मोर्चे पर भी ट्रंप सरकार के फैसलों को लेकर तीखी बहस चली। ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई, इजरायल के साथ तेज़ हुए रणनीतिक संबंध, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर उठे सवालों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया। ईरान के मीनाब शहर में बच्चियों के स्कूल पर हमले के दावों को लेकर अमेरिका के भीतर भी नैतिक और राजनीतिक सवाल उठे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के सुरक्षाकर्मियों को रिश्वत देकर उन्हें अपने साथ मिलाने और फिर उन्हें पत्नी समेत अगवा करने के आरोप भी गंभीर विवाद का विषय बने। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या अमेरिकी लोकतंत्र और उसकी विदेश नीति लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वफादार रह रही है, या सत्ता और हिंसा की भाषा उसकी पहचान बनती जा रही है।
चुनाव परिणामों ने इन सवालों का जवाब मतदाताओं की ओर से दे दिया। डेमोक्रेट्स ने टेक्सास, साउथ कैरोलाइना, आयोवा, कंसास, ओहायो, मेन और नॉर्थ कैरोलाइना जैसे राज्यों में सीनेट सीटें जीतीं, जिन्हें लंबे समय से रिपब्लिकन का मजबूत गढ़ माना जाता था। खासकर कंसास में डेमोक्रेट ने लगभग एक सदी बाद सीनेट सीट जीती, जबकि टेक्सास में डेमोक्रेट को 1988 के बाद पहली बार सीनेट जीत मिली।
प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स ने दो दर्जन से अधिक सीटें जीतीं। कई ऐसे क्षेत्रों में भी उन्हें जीत मिली, जहाँ 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को दो अंकों से अधिक मतों का बढ़त मिली थी। यह दर्शाता है कि मतदाताओं की नाराजगी केवल बड़े शहरों या परंपरागत उदारवादी इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण इलाकों, उपनगरों और रिपब्लिकन-बहुल क्षेत्रों तक फैली थी।
इन नतीजों में कुछ परिणाम अमेरिकी राजनीति के लिए ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। मिशिगन से डेमोक्रेट अब्दुल एल-सय्यद ने रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हराकर अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बनने का गौरव हासिल किया। मिस्री प्रवासियों के पुत्र एल-सय्यद की जीत ने यह संदेश दिया कि धर्म, पहचान और वंश के आधार पर की गई राजनीति से मतदाता प्रभावित नहीं होते। चुनाव प्रचार के दौरान उनके धर्म और मध्य पूर्व नीति पर उठाए गए सवालों के बावजूद उन्होंने स्पष्ट बढ़त के साथ जीत हासिल की।
मिनेसोटा से इल्हान उमर ने भी पांचवीं बार जीत दर्ज की। उनकी नागरिकता और व्यक्तिगत जीवन को लेकर उठाए गए विवादों के बावजूद मतदाताओं ने उन पर भरोसा दोहराया। जॉर्जिया में डेमोक्रेट केइशा लांस बॉटम्स ने रिपब्लिकन रिक जैक्सन को हराकर अमेरिका की पहली अश्वेत महिला राज्यपाल चुनी गईं। उनकी जीत ने जॉर्जिया में 24 साल से चल रहा रिपब्लिकन नियंत्रण भी तोड़ा।
अब सवाल यह है कि डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में आए कांग्रेस का ट्रंप के शेष कार्यकाल पर क्या असर पड़ेगा। अमेरिकी संविधान में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत है। राष्ट्रपति, कांग्रेस और न्यायपालिका के अधिकार अलग-अलग हैं। राष्ट्रपति संसद के प्रति उस अर्थ में उत्तरदायी नहीं होता जैसे संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री होता है। इसलिए चुनाव हारने के बावजूद ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे और कार्यपालिका के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी अब कानून बनाने की प्रक्रिया होगी। किसी भी बिल को कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों की मंजूरी चाहिए। डेमोक्रेट्स के दोनों सदनों पर कब्ज़े के बाद ट्रंप के पक्ष में बड़े कानूनी प्रस्ताव पास कराना लगभग असंभव हो जाएगा। बजट पर कांग्रेस का नियंत्रण होता है, इसलिए उनकी प्राथमिकता वाली परियोजनाओं, सुरक्षा कार्यक्रमों या विदेशी सहायता के लिए धन मंजूर कराना भी कठिन होगा।
राष्ट्रपति द्वारा नामित न्यायाधीशों, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सीनेट की स्वीकृति जरूरी होती है। अब डेमोक्रेट-नियंत्रित सीनेट उनकी विवादास्पद नियुक्तियों को रोक सकती है। इसके अलावा प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स जांच शुरू कर सकते हैं, गवाहों को बुला सकते हैं और सरकारी दस्तावेज मांग सकते हैं। महाभियोग की प्रक्रिया भी प्रतिनिधि सभा से शुरू होती है, इसलिए ट्रंप पर राजनीतिक और कानूनी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि महाभियोग लागू करने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो डेमोक्रेट्स के पास अभी नहीं है।
यह परिणाम केवल पार्टीगत जीत-हार नहीं है; यह अमेरिकी जनता का राजनीतिक संदेश भी है। मतदाताओं ने व्यक्तिगत हमलों, विभाजनकारी भाषा, आर्थिक असुरक्षा और विदेश नीति के जोखिमों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई है। ट्रंप ने स्वीकार किया है कि ईरान से जुड़े युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान पहुंचाया, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वे अपना फैसला दोबारा करेंगे। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने इसे अमेरिकी जनता का “युद्ध को ना” कहना बताया।
फिर भी यह मानना कि सत्ता का संतुलन बदलने से सब कुछ बदल जाएगा, अति-सरलीकरण होगा। ट्रंप के निर्णयों के पीछे कॉर्पोरेट हित, रक्षा उद्योग, ऊर्जा लॉबी और विदेश नीति से जुड़े प्रभावशाली समूहों की भूमिका बनी रहेगी। कांग्रेस में डेमोक्रेटिक बहुमत नीतियों को रोक सकता है, जांच कर सकता है और जवाबदेही तय कर सकता है, लेकिन सत्ता की गहरी संरचनाओं को बदलना उतना आसान नहीं है।
कांग्रेस सांसद अभिषेक सिंघवी की टिप्पणी इस राजनीतिक उलटफेर का तीखा व्यंग्य है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के बजाय ईरान ने अमेरिका में “रेजीम चेंज” कर दिया। यह कथन व्यंग्यात्मक है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर संदेश है: जब नेतृत्व युद्ध, डर और विभाजन की राजनीति अपनाता है, तो लोकतंत्र अंततः उसे वोट की ताकत से जवाब देता है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों ने यही दिखाया है कि जनता की मर्जी आखिरकार सत्ता की सबसे बड़ी जांच होती है।
