-सचिन कुमार गौतम
मोदी सरकार के बीते बारह वर्षों में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं लगातार गहराई हैं। एक ओर कार्पोरेट पूंजी का मीडिया पर बढ़ता नियंत्रण स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए बाधा बनता जा रहा है, तो दूसरी ओर सरकार का रवैया भी निर्भीक, स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता के लिए चुनौती पैदा कर रहा है। इसी कड़ी में अब डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून को पत्रकारिता के लिए बड़ी रुकावट माना जा रहा है। इस चुनौती को चुनौती देने के लिए डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
डीएनपीए की ओर से 21 समाचार प्रकाशकों ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। इनमें ऐसे मीडिया संस्थान भी शामिल हैं, जिनका स्वामित्व गौतम अडानी और मुकेश अंबानी से जुड़े समूहों के पास है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन संस्थानों पर अक्सर सरकार के प्रति झुकाव के आरोप लगते रहे हैं, वे भी इस कानून के संभावित दुष्प्रभावों से चिंतित हैं। इससे साफ है कि मुद्दा किसी एक पक्ष या किसी एक मीडिया घराने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका का है।
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने डीएनपीए की याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को रखी है। कोर्ट ने याचिका के साथ-साथ विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग पर भी नोटिस जारी किया है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है और न ही बिना सरकार की सुनवाई के रोक लगाई है। फिलहाल कोर्ट यह तय करेगा कि नागरिकों की निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यही संतुलन इस पूरे मामले का केंद्रीय सवाल है।
कानून क्या कहता है
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 भारत का पहला व्यापक डेटा संरक्षण कानून है, जिसे 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली थी। इसका उद्देश्य नागरिकों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा डेटा के वैध उपयोग के बीच संतुलन बनाना है। केंद्र सरकार ने इससे जुड़े डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025 को 14 नवंबर 2025 को अधिसूचित किया, जिससे कानून का पूरा ढांचा लागू हुआ।
इन नियमों के तहत डेटा सुरक्षा में चूक या उल्लंघन की स्थिति में डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड भारी जुर्माना लगा सकता है। सुरक्षा संबंधी उचित सावधानियां न रखने पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है, जबकि डेटा लीक की सूचना न देने या बच्चों से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने पर 200 करोड़ रुपये तक का दंड हो सकता है। अन्य उल्लंघनों पर 50 करोड़ रुपये तक का जुर्माना प्रावधान है।
पत्रकारिता को खतरा क्यों
तकनीकी युग में निजी डेटा की सुरक्षा वाकई अहम मुद्दा है। डेटा लीक, डिजिटल निगरानी और व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग के खतरे लगातार बढ़े हैं। इसलिए नागरिकों की निजता की रक्षा के लिए कानून बनाना अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब निजता की रक्षा के नाम पर ऐसे प्रावधान बन जाएं, जिनका असर जनहित की जानकारी उजागर करने वाली पत्रकारिता पर पड़े।
डीएनपीए का मुख्य आरोप है कि इस कानून में पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट और लिखित छूट नहीं दी गई है। याचिका के मुताबिक, सूचना, पूर्व सहमति, सहमति वापस लेने और व्यक्तिगत डेटा मिटाने से जुड़े प्रावधान पत्रकारों, संपादकों और प्रकाशकों पर लागू हो सकते हैं। यह स्थिति सामान्य पत्रकारिता के कामकाज से टकराती है, क्योंकि पत्रकार को अक्सर किसी व्यक्ति की सहमति लिए बिना ही साक्ष्य जुटाने, सूत्रों से बात करने और जनहित के मामलों की जांच करनी पड़ती है।
सबसे बड़ी चिंता खोजी पत्रकारिता की है। मान लीजिए कोई पत्रकार किसी अधिकारी, नेता या कंपनी पर भ्रष्टाचार के सबूत जुटा रहा है। यदि उसे प्रकाशन से पहले संबंधित व्यक्ति को सूचित करना पड़े या उसकी सहमति लेनी पड़े, तो उस व्यक्ति को समय मिल जाएगा कि वह सबूत नष्ट करे, गवाहों को प्रभावित करे या खबर को रोकने की कोशिश करे। डीएनपीए का कहना है कि ऐसा प्रावधान प्रभावी रूप से पूर्व-सेंसरशिप की स्थिति पैदा कर सकता है।
सूत्रों की सुरक्षा का सवाल
पत्रकारिता की नींव गोपनीय सूत्रों पर टिकी होती है। भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट अनियमितताओं, चुनावी गड़बड़ियों या सरकारी कामकाज की जानकारी अक्सर ऐसे लोग देते हैं, जो अपनी पहचान उजागर होने से डरते हैं। यदि कानून के तहत सरकार को डेटा से जुड़ी जानकारी मांगने की व्यापक शक्ति मिल जाए और उसमें स्पष्ट न्यायिक निगरानी या आवश्यकता तथा आनुपातिकता की कड़ी शर्तें न हों, तो पत्रकारों के सूत्रों की पहचान का खतरा बढ़ सकता है।
डीएनपीए ने विशेष रूप से धारा 36 और इससे जुड़े नियमों को चुनौती दी है, जिनके तहत सरकार डेटा संभालने वाले संगठनों से जानकारी मांग सकती है। एसोसिएशन का तर्क है कि इस शक्ति का दुरुपयोग होकर पत्रकारिता के स्रोतों तक पहुंचने की कोशिश हो सकती है। यह न केवल पत्रकार की सुरक्षा के लिए खतरनाक है, बल्कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति सरकार या शक्तिशाली संस्था के खिलाफ गवाही देने से पहले दो बार सोचेगा।
खबर मिटाने की मांग का खतरा
एक और गंभीर चिंता यह है कि व्यक्तिगत डेटा को सुधारने, अपडेट करने या मिटाने के अधिकार का इस्तेमाल प्रकाशित खबरों को दबाने के लिए किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपने डेटा को हटाने या संशोधित करने की मांग करे, तो समाचार संस्थान पर दबाव बन सकता है कि वह सत्यापित खबर को हटाए या उसमें बदलाव करे। यह स्थिति पत्रकारिता के लिए खतरनाक है, क्योंकि समाचार केवल व्यक्तिगत डेटा नहीं होता; वह सार्वजनिक हित, साक्ष्य और जवाबदेही से जुड़ा होता है।
इसका सीधा असर यह होगा कि समाचार संस्थान बड़े घोटालों, भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ी खबरें छापने से पहले कानूनी जोखिम और आर्थिक दंड की आशंका से बचेंगे। डर का माहौल ऐसा बन सकता है कि संपादक जरूरी खबर छापने की बजाय उसे टाल दें। इससे पत्रकारिता अपनी मूल भूमिका, यानी सत्ता पर नजर रखने और जनता को सूचित करने, से हटकर महज घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित हो जाएगी।
संतुलन की जरूरत
यह बहस इस बात के खिलाफ नहीं है कि निजता की रक्षा न हो। नागरिक का अपनी निजी जानकारी पर नियंत्रण रखना मौलिक महत्व का अधिकार है और उसकी रक्षा आवश्यक है। सवाल यह है कि क्या निजता की रक्षा के लिए बनाए गए नियम पत्रकारिता पर भी उसी तरह लागू होने चाहिए, जिस तरह किसी व्यावसायिक कंपनी पर लागू होते हैं। जनहित की पत्रकारिता और व्यावसायिक डेटा प्रोसेसिंग में अंतर करना जरूरी है।
रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त में मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच हुई बैठक में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा का आश्वासन दिया गया था। लेकिन डीएनपीए का कहना है कि बिना स्पष्ट लिखित छूट के मात्र आश्वासन पर्याप्त नहीं है। जब तक कानून में पत्रकारिता के लिए साफ सुरक्षा नहीं होगी, समाचार संस्थानों की चिंताएं खत्म नहीं होंगी।
अब गेंद अदालत में
अब यह तय करना सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है कि भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता का रास्ता कैसा होगा। यदि अदालत कानून के प्रावधानों को निरस्त करती है या पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा जोड़ने का निर्देश देती है, तो खोजी पत्रकारिता के लिए रास्ता खुला रहेगा। लेकिन यदि मौजूदा ढांचा बरकरार रहता है, तो जनहित की खबरें छापना और भी मुश्किल हो सकता है।
सरकार के हित में यही हो सकता है कि उसके पक्ष में बोलने वाले पत्रकार सुविधाजनक रहें। लेकिन लोकतंत्र के हित में यह नहीं है। एक स्वस्थ लोकतंत्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए, जो सवाल पूछे, जवाबदेही तय करे और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करे। इसलिए निजता की रक्षा और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन न केवल कानूनी मुद्दा है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
