-सचिन कुमार गौतम
31 अक्टूबर को गुजरात के एकतानगर में राष्ट्रीय एकता दिवस के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि विदेश जाकर देश-विरोधी ताक़तों के सहारे देश को कमज़ोर करने की साज़िश रची जा रही है। उन्होंने कहा कि यह पहचानना जरूरी है कि विदेश में कौन किससे गुप्त रूप से मिल रहा है, कौन भारत-विरोधी ताक़तों का समर्थन कर रहा है और कौन देश के दुश्मनों की भाषा बोल रहा है।
इस बयान के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को खुली बहस की चुनौती दे दी। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने और विदेशी समर्थन से ही पद पर बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश की आर्थिक व्यवस्था विदेशियों के नियंत्रण और समर्थन में है, जबकि विदेशी सोशल मीडिया प्रधानमंत्री के साथ खड़ा है।
2 नवंबर को राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर कहा कि वे किसी भी मंच, किसी भी समय और किसी भी जगह पर मोदी से बहस करने को तैयार हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री बताएं कि देशद्रोही कौन है, विदेशी ताक़तों से किसका कनेक्शन है और वह किस तरह का है।
अगले दिन, यानी 3 नवंबर को, राहुल ने अपनी चुनौती दोहराते हुए कहा कि 24 घंटे बीत चुके हैं, अब प्रधानमंत्री आगे आएं। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि दोनों एक मंच पर बैठें, मीडिया मौजूद रहे, देश के युवा देखें और चाहें तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को जज बना लिया जाए। उनका कहना था कि इस बहस से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
राहुल ने यह भी सवाल उठाया कि जब उन पर कई मानहानि के मामले दर्ज हो सकते हैं, तो विदेशी कनेक्शन से जुड़े आरोप पर सरकार मानहानि का मुकदमा क्यों नहीं लगा रही है। उन्होंने कहा कि अगर आरोप गलत हैं तो मुकदमा लगाया जाए और फिर खुलकर बहस हो।
यह विवाद अकेले एक बयान तक सीमित नहीं रहा। 31 अक्टूबर को विपक्ष ने मॉक पार्लियामेंट आयोजित किया, जिसमें चुनाव आयोग प्रमुख ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग का प्रस्ताव रखा गया। 1 नवंबर को इंडिया ब्लॉक ने रामलीला मैदान में बड़ी रैली की, जिसमें लोकतंत्र और मतदान अधिकारों को लेकर मुद्दे उठाए गए।
इसके बाद 2 और 3 नवंबर को राहुल गांधी की ओर से खुली बहस की चुनौती दोहराई गई। चार दिनों में विपक्ष के ये हमले सरकार के लिए दबाव बन गए, और भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह साफ झलकता है कि मुद्दा साधारण बयानबाजी से आगे बढ़ चुका है।
राहुल की चुनौती के बाद भाजपा नेता एक-एक कर आगे आए। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस चुनौती को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया, जबकि निशिकांत दुबे ने कहा कि पहले उनसे बहस हो, फिर उनके नेता पर आए। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और विशेष सत्र बुलाकर एसआईआर पर बहस करने को तैयार है।
लेकिन विपक्ष का तर्क है कि संसद में चर्चा का रास्ता खुला रखा जाए तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को स्वयं सदन में आकर जवाब देना चाहिए। राहुल के समर्थकों का कहना है कि जब सवाल सीधे प्रधानमंत्री से हो, तो जवाब अन्य मंत्रियों या राज्यों के मुख्यमंत्रियों से दिलाना राजनीतिक टालमटोल जैसा लगता है।
2014 में मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया गया था, जो यूपीए शासन के दौर की निराशा और युवाओं की नाराजगी का इलाज बन सकते थे। उनके सामने रोजगार, विकास, भ्रष्टाचार पर नकेल और राष्ट्रवाद के वादे थे। लोगों ने इन्हीं वादों पर उन्हें सत्ता सौंपी।
लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी के सामने कई सवाल खड़े हुए हैं—रोजगार के अवसर, महंगाई, शिक्षा और भविष्य की चिंता। आलोचकों का कहना है कि जुमलों और वास्तविकता के बीच की दूरी अब युवाओं को स्पष्ट दिख रही है। इसी निराशा को राहुल गांधी की बहस की चुनौती राजनीतिक अभिव्यक्ति दे रही है।
मुद्दा केवल राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच का व्यक्तिगत टकराव नहीं है। सवाल यह है कि जब कोई नेता विपक्ष पर देशद्रोह या विदेशी साज़िश का आरोप लगाता है, तो क्या उसे सार्वजनिक रूप से सबूत और जवाबदेही भी देनी चाहिए। राहुल की चुनौती इसी जवाबदेही को मंच देने की मांग है।
भाजपा के लिए चुनौती यह है कि अगर आरोप बेबुनियाद हैं, तो प्रधानमंत्री स्वयं बहस में आकर उन्हें खारिज कर सकते हैं। और अगर बहस से बचा जाता है, तो विपक्ष इसे अपनी बात को सही साबित करने का सबूत पेश करेगा। इसलिए अब देश के सामने एक ही सवाल है—क्या प्रधानमंत्री खुली बहस के लिए हां कहेंगे, या इसे ठुकरा देंगे?
