-सचिन कुमार गौतम
केंद्र में नरेन्द्र मोदी के बारह साल के शासन का एक गंभीर परिणाम यह है कि सामान्य बुद्धि को ताक पर रखकर धर्म के नाम पर खुद को नुकसान पहुँचाने से लोग अब झिझकने लगे हैं। यह बात विशेष रूप से तब सामने आती है जब देश दीपावली जैसे पर्व की तैयारी कर रहा हो। फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला यह उत्सव आज प्रदूषण की कालिमा से घिर चुका है। बरसों से दीपावली के पहले और बाद वायु तथा ध्वनि प्रदूषण चिंता का बड़ा विषय बन चुका है। दिल्ली समेत देश के कई बड़े शहरों में हवा ऐसी हो चुकी है कि उसमें साँस लेना भी खतरनाक हो गया है।
पहले पानी को इतना प्रदूषित कर दिया गया कि वॉटर प्यूरीफायर अब अनिवार्य उपकरण बन गए हैं। हर संपन्न घर में उसे पाया जा सकता है, जहाँ नहीं है वहाँ बोतलबंद पानी खरीदा जाता है। लेकिन गरीबों के लिए यह अब भी विलासिता है। उनके घरों में नल तक नहीं होता; वे नगर निगम के नलों, तालाबों या कुओं से पानी भरते हैं और कई जगहों पर दूर-दराज से पानी ढोकर लाते हैं। ऐसे में उस पानी को शुद्ध करने की बात तो और भी दूर की है।
पानी के बाद अब हमला हवा पर हुआ है। प्रकृति के अनमोल उपहार—हवा और पानी—धीरे-धीरे अमीरों के निजी संसाधन बनते जा रहे हैं। हवा को अभी बोतल में बंद करके नहीं बेचा जा रहा, पर एयर प्यूरीफायर तेजी से बिक रहे हैं। जिन घरों में यह नहीं है, वहाँ लोग पौधों से हवा शुद्ध करने की कोशिश करते हैं या मास्क पहनते हैं। कोविड काल ने मास्क पहनना सिखाया था, अब वह प्रदूषण से बचाव का साधन बन गया है। पर गरीबों के लिए यह भी एक विलासिता ही है।
भारत में पूँजीवाद का ऐसा चेहरा देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना शायद उसके कट्टर समर्थकों ने भी नहीं की होगी—कि गरीबों और असहायों से उनके जीने के मूल आधार, यानी हवा और पानी, ही छिन लिए जाएँ। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है कि देश के कई शहरों की हवा अब साँस लेने लायक नहीं रह गई है।
प्रदूषण की नियति
वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई में दो सौ, तीन सौ के आँकड़े पार करना अब मामूली बात मानी जाने लगी है, जबकि यह प्राणवायु नहीं, जहरीली हवा होती है। हर साल अक्टूबर से दिसंबर-जनवरी तक यही हालात बने रहते हैं। दिल्ली के आसपास पराली जलाने को लंबे समय तक प्रदूषण का प्रमुख कारण बताया जाता रहा। पर जब पराली नहीं जलती, तब भी आकाश में धुएँ और धुंध की मोटी परत दिखती है। इसके ऊपर पटाखों से हालात और गंभीर हो जाते हैं।
प्रदूषण के प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर भारत में सूक्ष्म प्रदूषकों का स्तर मानकों तक घटाया जा सके, तो दिल्ली-एनसीआर के निवासियों की जीवन प्रत्याशा में आठ साल से अधिक की वृद्धि हो सकती है। यानी दूषित हवा केवल असुविधा नहीं, जीवन को छोटा करने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
कायदे से समाज को ही पहल करनी चाहिए कि वह स्वच्छ वायु बनाए रखने में अपना योगदान दे। दीपावली अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की जीत का पर्व है। दीये जलाना, मिठाई बाँटना, परिवार से मिलना और नई उम्मीदें जोड़ना इसका सार है। पर जब वही पर्व धधकते पटाखों, जहरीले धुएँ और भयंकर शोर में बदल जाए, तो उसका मूल अर्थ ही संकट में पड़ जाता है।
समस्या यह है कि इस मुद्दे को भी धर्म और राजनीति से जोड़ दिया गया है। मानो हिंदुत्व की माला जपने वालों को शुद्ध हवा मिलेगी और बाकी लोग दमघोंटू माहौल में रहने के लिए अभिशप्त हैं। जबकि हवा किसी की निजी संपत्ति नहीं है। वह अमीर-गरीब, सत्ताधारी-विपक्ष, धार्मिक-अधार्मिक सबके फेफड़ों में समान रूप से प्रवेश करती है।
दिल्ली का उलटा रुख
नौबत यहाँ तक आ गई है कि पुलिस भी दबाव में दिखने लगी है। बीते 25 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने “नो टू क्रैकर्स, यस टू ग्रीनर दीवाली” के नाम से एक संदेश पोस्ट किया था, जिसमें पटाखों से परहेज़ और हरित दिवाली की अपील की गई थी। पर कुछ ही घंटों में उसे सोशल मीडिया हैंडल से हटा लिया गया। यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली प्रशासन ने दीपावली के दौरान पटाखों को लेकर अपना रुख बदला हो।
2024 की दीपावली से पहले दिल्ली सरकार ने 1 जनवरी 2025 तक पटाखों के निर्माण, बिक्री, भंडारण और जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध के कमजोर क्रियान्वयन की आलोचना की और उसे स्थायी बनाने पर विचार करने का सुझाव दिया। दिसंबर 2024 में दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने पटाखों पर साल भर का प्रतिबंध लगा दिया है।
पर स्थिति जल्दी बदल गई। अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध में ढील देने से मना किया, लेकिन अक्टूबर में उसने दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के अवसर पर प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और उपयोग की सीमित अनुमति दे दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये पटाखे नीरी के तय मानकों को पूरा करें, लाइसेंसी विक्रेताओं के माध्यम से ही बिकें और केवल निर्धारित समय में ही जलाए जाएँ। दिल्ली सरकार और केंद्र ने इस ढील का समर्थन किया।
उस समय शहर का एक्यूआई लगभग 500 तक पहुँच गया था, जो गैस चैंबर जैसा खतरनाक स्तर था। अब भी हालात उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। इस साल भी सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तक तथा रात 8 से 10 बजे तक केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी है; 9 नवंबर से पूर्ण प्रतिबंध फिर लागू होगा। अस्पतालों, नर्सिंग होमों और निर्धारित साइलेंस ज़ोन के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाना प्रतिबंधित रहेगा।
सवाल यह है कि जब वैज्ञानिक आँकड़े, न्यायालय के निर्देश और स्वास्थ्य की चेतावनियाँ एक ही दिशा में हों, तो सत्ता क्यों हर बार “परंपरा” के नाम पर पीछे हटती है? परंपरा का सम्मान जरूरी है, पर परंपरा का अर्थ जनता की सेहत को दाँव पर लगाना नहीं हो सकता।
मुंबई का विवाद
यही तनाव मुंबई में भी देखने को मिला। वहाँ हवा खराब हो चुकी है और बॉम्बे हाईकोर्ट तथा बृहन्मुंबई नगर निगम ने पर्यावरण-अनुकूल दीपावली मनाने की मुहिम शुरू की। इसके तहत कुछ चर्चित हस्तियों से जागरूकता वीडियो बनवाए गए। दीया मिर्जा, माधुरी दीक्षित, निशिगंधा वाड और क्रिकेटर अजिंक्य रहाणे इसमें शामिल थे।
दीया मिर्जा ने पटाखों से परहेज़ कर प्रदूषण-मुक्त दीपावली मनाने की अपील की। इस पर मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित सातम ने आपत्ति जताई और लिखा कि “हमें दीया मिर्जा से दीवाली मनाना सीखने की जरूरत नहीं है; हमारी परंपराएँ हमारी संस्कृति में गहराई से रची-बसी हैं।” उनकी आपत्ति के कुछ ही घंटों बाद नगर आयुक्त अश्विनी भिड़े के नेतृत्व वाली बीएमसी ने मिर्जा का वीडियो अपने सोशल मीडिया पेज से हटा दिया।
हैरानी की बात यह है कि उसी अभियान के तहत माधुरी दीक्षित, निशिगंधा वाड और अजिंक्य रहाणे के वीडियो बीएमसी के एक्स तथा इंस्टाग्राम पेज पर बने रहे। नगर निकाय ने स्पष्ट नहीं किया कि केवल दीया मिर्जा का वीडियो ही क्यों हटाया गया। यह अंतर बताता है कि जनस्वास्थ्य का संदेश नहीं, बल्कि वक्ता की राजनीतिक पहचान निर्णायक बन गई।
बाद में मुंबई की मेयर रितु तावड़े ने कहा कि दीया मिर्जा को बीएमसी के आधिकारिक पोर्टल या किसी आयोजन में शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ट्रोल करती हैं। दीया मिर्जा ने जवाब दिया कि वायु प्रदूषण जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला है और इसे कम करने के हर प्रयास का स्वागत होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने इस वीडियो के लिए कोई पैसा नहीं लिया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस वीडियो हटाए जाने पर नाराजगी जताई और बीएमसी से उसे बहाल करने को कहा। यह घटना दिखाती है कि जब नागरिक स्वास्थ्य की बात भी सत्ता की राजनीतिक पसंद के विरुद्ध जाती है, तो उसे दबाने की कोशिश की जा सकती है।
स्वच्छ हवा किसका अधिकार
दिल्ली और मुंबई के ये प्रसंग एक ही सवाल उठाते हैं: क्या स्वच्छ हवा अब केवल उनका अधिकार रह गई है जो एयर प्यूरीफायर, बंद कमरे और महँगे मास्क खरीद सकते हैं? जिनके पास ये साधन नहीं हैं, वे क्या करें? वे तो सड़कों पर, बसों में, बाजारों में और खुले में काम करने के लिए मजबूर हैं। प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ता है, जिनके पास उससे बचने का कोई विकल्प नहीं है।
दीपावली का उत्सव त्याग, प्रकाश और सामूहिक खुशी का पर्व है। उसे ध्वस्त करने वाला पटाखों का अंधाधुंध इस्तेमाल न तो धर्म की आवश्यकता है और न ही संस्कृति की रक्षा। जो समाज अपने बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों को जहरीली हवा में साँस लेने के लिए मजबूर कर दे, वह अपनी परंपरा की रक्षा नहीं कर रहा; वह उसका अपमान कर रहा है।
सरकार का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक सलाह, न्यायालय के निर्देश और जनस्वास्थ्य को राजनीति से ऊपर रखे। नागरिकों का कर्तव्य है कि वे उत्सव को प्रकाश, संयम और जिम्मेदारी के साथ मनाएँ। अगर धर्म के नाम पर साँस लेने लायक हवा तक से इनकार किया जाएगा, तो यह न केवल पर्यावरण की हार होगी, बल्कि लोकतंत्र और सामान्य जीवन की भी हार होगी।
