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हिंदी दिवस पर अमित शाह बोले- हिंदी का भारतीय भाषाओं से कोई मुकाबला नहीं

नई दिल्ली, 15 सितंबर (वेब वार्ता)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हिंदी दिवस के अवसर पर भारतीय भाषाओं की विविधता को देश की ताकत बताते हुए कहा कि हिंदी का किसी दूसरी भारतीय भाषा से कोई मुकाबला नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा अपने साथ समृद्ध इतिहास, लोक परंपराएं और संस्कृति लेकर चलती है। भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय उनके संरक्षण और विकास पर जोर दिया जाना चाहिए।

वर्चुअल संबोधन में अमित शाह ने युवाओं से दुनिया की अधिक से अधिक भाषाएं सीखने की अपील की, लेकिन साथ ही अपनी मातृभाषा से जुड़े रहने का संदेश दिया। उन्होंने माता-पिता से भी बच्चों के साथ मातृभाषा में बातचीत करने का आग्रह किया। उनके अनुसार, अपनी भाषा बोलने को लेकर किसी व्यक्ति में हीन भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भाषा ही मनुष्य को उसकी मां, मिट्टी, इतिहास और संस्कृति से जोड़ती है।

भारतीय भाषाओं ने राष्ट्र निर्माण में निभाई अहम भूमिका

अमित शाह ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय भाषाओं ने राष्ट्र निर्माण, प्रशासन और विकास से जुड़ी जानकारी को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं ने जनजागरण, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के आदर्शों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई विविधता को कमजोरी के रूप में नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। हर भाषा की अपनी विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत है।

‘मेरी मातृभाषा गुजराती, लेकिन हिंदी से सीधे जुड़ते हैं लोग’

गृह मंत्री ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती है, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों से संवाद करने के दौरान हिंदी ऐसी भाषा के रूप में सामने आती है, जिसके माध्यम से वह सीधे लोगों से जुड़ पाते हैं।

उन्होंने कहा कि हिंदी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच संवाद का माध्यम बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, इसका अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करना नहीं है।

गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों ने भी हिंदी को बढ़ाया

अमित शाह ने हिंदी के विकास में गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती की मातृभाषा गुजराती थी, लेकिन उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में लिखी।

उन्होंने महात्मा गांधी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी ने वर्ष 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना था।

शाह ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नेताजी बंगाली भाषी थे, लेकिन उन्होंने आजाद हिंद फौज में हिंदी को संवाद की भाषा के रूप में महत्व दिया। उन्होंने देश को ‘जय हिंद’ जैसा लोकप्रिय राष्ट्रीय अभिवादन भी दिया।

भाषा को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति से जोड़ा

गृह मंत्री ने अपने संबोधन में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से औपनिवेशिक मानसिकता की गुलामी से बाहर निकलने का आह्वान किया है।

शाह के अनुसार, भाषा इस मानसिकता से मुक्ति हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

कानूनों में बदलाव को बताया राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना

अमित शाह ने प्रशासनिक और कानूनी बदलावों का उदाहरण देते हुए कहा कि राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करना केवल नाम परिवर्तन नहीं था। इसी तरह अंग्रेजों के समय बनाए गए आपराधिक कानूनों के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू करना भी केवल शब्दों में बदलाव नहीं है।

उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की पुनर्स्थापना से जोड़ते हुए कहा कि देश को अपनी आवश्यकताओं और अपनी परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

14 सितंबर को मनाया जाता है हिंदी दिवस

हिंदी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1949 में संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।

हिंदी दिवस के अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और भाषाई विविधता की भावना को मजबूत करना है।

अमित शाह ने अपने संबोधन के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा देने के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान पर भी जोर दिया। उनका संदेश रहा कि भारतीय भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सभी भाषाओं की समृद्ध परंपरा को संरक्षित और विकसित किया जाना चाहिए।

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