नई दिल्ली, 12 सितंबर (वेब वार्ता)। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच तेल की बढ़ती कीमतें सदस्य देशों के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आ सकती हैं। एक ओर चीन, रूस, भारत और ब्राजील जैसे देश वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका और उसके सहयोगियों के प्रभाव को संतुलित करने के लिए ब्रिक्स को महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखते हैं, वहीं दूसरी ओर संगठन के कुछ सदस्य देशों के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक और सुरक्षा संबंध हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और तेल के बढ़ते दाम ब्रिक्स की एकजुटता की परीक्षा ले सकते हैं।
ब्रिक्स में दुनिया की लगभग आधी आबादी निवास करती है और वैश्विक आर्थिक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत बताई जाती है। इसके बावजूद संगठन के सभी सदस्य देशों के रणनीतिक और आर्थिक हित हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। यही अंतर मौजूदा परिस्थितियों में ब्रिक्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
होर्मुज को लेकर ईरान का रुख अहम
अमेरिका के साथ संघर्ष के बीच ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को रणनीतिक दबाव के माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। इस मार्ग से वैश्विक तेल व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। इसके कारण तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है और कीमतों पर दबाव बना है।
ईरान के लिए ब्रिक्स सम्मेलन अपनी आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति को प्रदर्शित करने का अवसर भी है। वह यह संदेश देना चाहता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है और उसके साथ प्रभावशाली साझेदार देश मौजूद हैं।
चीन ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत हैं। भारत, चीन और रूस के साथ ईरान के संबंध भी उसके लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान का रुख ब्रिक्स के भीतर मतभेद पैदा कर सकता है, क्योंकि कई सदस्य देशों की प्राथमिकता ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति और तेल की कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है।
ब्रिक्स में अलग-अलग रणनीतिक हित
ब्रिक्स के भीतर सदस्य देशों के हितों में अंतर इस समय स्पष्ट दिखाई देता है। चीन, रूस और ईरान संगठन को ऐसी वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था के निर्माण के अवसर के रूप में देखते हैं, जो अमेरिका के प्रभाव को संतुलित कर सके।
इसके विपरीत कुछ सदस्य देशों के अमेरिका के साथ घनिष्ठ सुरक्षा और आर्थिक संबंध हैं। संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका का महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार है और उसके यहां अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। मिस्र भी अमेरिका से सैन्य सहायता प्राप्त करने वाला पश्चिम एशिया का महत्वपूर्ण साझेदार है।
ऐसे में ब्रिक्स के भीतर किसी एक साझा रणनीतिक रुख पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया के संघर्ष जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
भारत के सामने संतुलन साधने की चुनौती
भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन वैश्विक राजनीति में संतुलन साधने का महत्वपूर्ण अवसर है। भारत के चीन के साथ रणनीतिक मतभेद और प्रतिस्पर्धा है, वहीं रूस के साथ उसके लंबे समय से मजबूत संबंध हैं। इसके साथ ही भारत अमेरिका के साथ भी अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत कर रहा है।
ऐसे में भारत के लिए ब्रिक्स मंच पर रूस और अन्य सदस्य देशों के साथ सहयोग बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना महत्वपूर्ण होगा। ऊर्जा सुरक्षा भी भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है, इसलिए तेल की कीमतों में तेज वृद्धि भारत के आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।
पुतिन के लिए पश्चिम को संदेश देने का अवसर
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए भी ब्रिक्स सम्मेलन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच रूस यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि उसके पास मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदार मौजूद हैं।
रूस और चीन के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। चीन रूस के लिए कई महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति का स्रोत बना हुआ है। दूसरी ओर भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है, जबकि ब्राजील रूस से उर्वरक प्राप्त करता है।
इन आर्थिक संबंधों के जरिए रूस यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद उसकी वैश्विक आर्थिक भागीदारी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
शी जिनपिंग के लिए भी अहम मंच
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए ब्रिक्स सम्मेलन अमेरिका के साथ संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है। सम्मेलन के जरिए चीन यह प्रदर्शित करना चाहता है कि वैश्विक दक्षिण के बड़े हिस्से के साथ उसके मजबूत संबंध हैं।
ब्रिक्स मंच चीन को अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के समानांतर उभरते आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को प्रदर्शित करने का अवसर देता है। आगामी अमेरिका यात्रा से पहले इस मंच पर चीन की सक्रिय भूमिका शी जिनपिंग की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।
तेल संकट के बीच ब्रिक्स की एकता की परीक्षा
ब्रिक्स का विस्तार और बढ़ता आर्थिक प्रभाव इसे वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण मंच बनाता है, लेकिन सदस्य देशों के अलग-अलग हित इसकी एकता के लिए चुनौती भी हैं। ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया का संघर्ष और अमेरिका के साथ संबंध ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सभी सदस्य देशों का दृष्टिकोण समान नहीं है।
ऐसे में मौजूदा सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग और वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की चर्चा तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की बढ़ती कीमतें और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान का रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है कि ब्रिक्स अपने अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के बीच किस तरह साझा सहमति कायम करता है। आने वाले समय में यही संतुलन ब्रिक्स की सामूहिक राजनीतिक और आर्थिक प्रभावशीलता की वास्तविक परीक्षा साबित हो सकता है।




