-बढ़ती बयानबाजी सैन्य तैयारियां और परमाणु तनाव ने दुनिया को खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया
पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां हर नया बयान और हर सैन्य गतिविधि वैश्विक चिंता का कारण बन रही है। ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ता तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की राजनीति अर्थव्यवस्था ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति पर पड़ रहा है। हाल के दिनों में दोनों पक्षों की ओर से आई तीखी प्रतिक्रियाओं सैन्य तैयारियों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ते विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि समय रहते कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया तो इसके गंभीर परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के संबंध पिछले चार दशकों से उतार चढ़ाव और अविश्वास से भरे रहे हैं। वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच संबंध लगातार खराब होते गए। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध परमाणु कार्यक्रम पर विवाद क्षेत्रीय संघर्ष और सैन्य गतिविधियों ने इस दूरी को और बढ़ा दिया। समय समय पर बातचीत और समझौतों की कोशिशें भी हुईं लेकिन आपसी अविश्वास इतना गहरा रहा कि स्थायी समाधान कभी सामने नहीं आ सका।
हाल के घटनाक्रमों ने इस तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार सख्त बयान दिए जा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि वह ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं देगा जबकि ईरान बार बार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। दोनों देशों के बीच यही सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है और इसी के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चिंता बनी रहती है।
स्थिति तब और अधिक संवेदनशील हो गई जब दोनों देशों के मीडिया और राजनीतिक हलकों से तीखी टिप्पणियां सामने आने लगीं। इस तरह की बयानबाजी केवल राजनीतिक संदेश नहीं होती बल्कि इससे दोनों देशों के समर्थकों और विरोधियों के बीच तनाव भी बढ़ता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शब्दों का भी उतना ही महत्व होता है जितना सैन्य शक्ति का। जब सार्वजनिक मंचों से कठोर भाषा का प्रयोग होता है तो कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ने लगती हैं।
पश्चिम एशिया पहले ही कई संघर्षों का केंद्र रहा है। इजराइल और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही प्रतिद्वंद्विता भी इस पूरे संकट को और जटिल बनाती है। अमेरिका इजराइल का प्रमुख सहयोगी है जबकि ईरान क्षेत्र के कई संगठनों और अपने सहयोगी देशों के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता है। ऐसे में यदि अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव बढ़ता है तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया में फैल सकता है। इससे अनेक देशों की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था भी इस तनाव से अछूती नहीं रह सकती। पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यदि किसी बड़े सैन्य संघर्ष के कारण तेल उत्पादन या समुद्री व्यापार प्रभावित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसका सीधा असर परिवहन उद्योग कृषि उत्पादन और आम लोगों की जीवन शैली पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी और कई देशों की आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है।
भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और पश्चिम एशिया उसके लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। यदि क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं। किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा और वापसी भी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। भारत लगातार सभी पक्षों से संयम बरतने और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की बात करता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सामने भी यह एक बड़ी परीक्षा है। वैश्विक शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सभी पक्ष बातचीत का रास्ता अपनाएं। किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई केवल अस्थायी समाधान दे सकती है लेकिन स्थायी शांति केवल कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह तनाव कम करने के लिए प्रभावी भूमिका निभाए।
तकनीकी और सैन्य दृष्टि से भी यह संघर्ष नई चुनौतियां सामने ला रहा है। आधुनिक ड्रोन मिसाइल प्रणाली साइबर युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य तकनीकों के कारण युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। यदि दो बड़े सैन्य शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संघर्ष बढ़ता है तो आधुनिक हथियारों का व्यापक उपयोग पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। यही कारण है कि रक्षा विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य के युद्ध पहले से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकते हैं।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ती आशंकाएं भी चिंता का बड़ा कारण हैं। यदि किसी भी स्तर पर परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला होता है या परमाणु प्रसार की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसके परिणाम केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेंगे। पर्यावरण मानव स्वास्थ्य और वैश्विक सुरक्षा पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए परमाणु मुद्दे पर संयम और पारदर्शिता दोनों ही आवश्यक हैं।
वर्तमान समय में सबसे अधिक आवश्यकता विश्वास बहाली की है। दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संवाद बहाल होना चाहिए। मध्यस्थ देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी सकारात्मक भूमिका निभानी होगी ताकि गलतफहमियां कम हों और किसी आकस्मिक सैन्य टकराव की संभावना समाप्त हो सके। इतिहास बताता है कि कई बड़े युद्ध केवल गलत आकलन और बढ़ती बयानबाजी के कारण शुरू हुए थे।
दुनिया पहले ही यूक्रेन संघर्ष आर्थिक अनिश्चितता जलवायु परिवर्तन और वैश्विक महंगाई जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। यदि यह संकट गहराता है तो वैश्विक व्यापार ऊर्जा आपूर्ति निवेश और सुरक्षा सभी प्रभावित होंगे। इसका असर विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों पर समान रूप से पड़ेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शक्ति प्रदर्शन के बजाय विवेक और संवाद को प्राथमिकता दी जाए। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति युद्ध में नहीं बल्कि शांति स्थापित करने की क्षमता में होती है। यदि अमेरिका और ईरान अपने मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो यह केवल दोनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए राहत की बात होगी। वर्तमान परिस्थितियां यही संदेश देती हैं कि युद्ध का कोई स्थायी विजेता नहीं होता जबकि शांति का लाभ पूरी मानवता को मिलता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तंभकार है)





