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मोबाइल फोन विनिर्माण योजना: आत्मनिर्भर भारत से वैश्विक प्रौद्योगिकी नेतृत्व की ओर एक निर्णायक कदम

-विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (एमपीएमएस) को मंजूरी दिया जाना भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का निर्णय है। 62,500 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान वाली यह योजना केवल मोबाइल फोन निर्माण बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, अनुसंधान, डिज़ाइन और नवाचार का अग्रणी केंद्र बनाना है।यह योजना ऐसे समय में लाई गई है, जब बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए लागू उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI-LSEM) 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है। नई योजना उस सफलता को अगले चरण तक ले जाने का प्रयास है। इसका कार्यकाल वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पाँच वर्षों का होगा।एमपीएमएस के अंतर्गत भारत में निर्मित मोबाइल फोन की पात्र बिक्री पर 2.25 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाएगा। यदि निर्माता प्रमुख पुर्जों और उप-असेंबलियों की घरेलू खरीद बढ़ाते हैं तो उन्हें 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलेगा।

वहीं भारतीय ब्रांडों को डिज़ाइन, अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए 3 प्रतिशत अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा। इससे स्पष्ट है कि सरकार केवल असेंबली आधारित उत्पादन नहीं, बल्कि वास्तविक तकनीकी क्षमता, नवाचार और बौद्धिक संपदा निर्माण को प्रोत्साहित करना चाहती है।सरकार का अनुमान है कि योजना की अवधि में देश में लगभग 39 लाख करोड़ रुपये मूल्य के मोबाइल फोन का संचयी उत्पादन होगा। साथ ही मोबाइल फोन निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि होगी तथा लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर इससे कहीं अधिक होंगे, जिससे लाखों युवाओं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं और महिलाओं को रोजगार मिलने की संभावना है।पिछले एक दशक में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2014-15 की तुलना में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग सात गुना तथा निर्यात ग्यारह गुना बढ़ चुका है। आज भारत मात्रा के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है और देश में उपयोग होने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन भारत में ही निर्मित हो रहे हैं।

वर्ष 2025 में स्मार्टफोन भारत का सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद बन गया, जिसने डीजल ईंधन और कटे-तराशे हीरों जैसे पारंपरिक निर्यात उत्पादों को भी पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रहा है और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र अब भारतीय अर्थव्यवस्था की नई विकास धुरी बनता जा रहा है।नई योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें भारतीय कंपनियों को अपने स्वयं के ब्रांड, डिज़ाइन और अनुसंधान विकसित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया गया है। लंबे समय तक भारत वैश्विक कंपनियों के लिए विनिर्माण केंद्र बना रहा, लेकिन अब लक्ष्य केवल निर्माण नहीं, बल्कि तकनीकी स्वावलंबन, भारतीय पेटेंट और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय ब्रांड तैयार करना है। घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर विशेष बल देने से मोबाइल फोन उद्योग में चिप,कैमरा मॉड्यूल, डिस्प्ले, बैटरी, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड और अन्य महत्वपूर्ण पुर्जों के निर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और आपूर्ति श्रृंखला अधिक मजबूत तथा सुरक्षित बनेगी।आज वैश्विक कंपनियाँ अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं।

ऐसे समय में भारत के पास कुशल मानव संसाधन,विशाल घरेलू बाजार,बेहतर अवसंरचना और अपेक्षाकृत स्थिर नीतिगत वातावरण जैसी महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं। एमपीएमएस इन सभी क्षमताओं को एकीकृत करते हुए भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।हालाँकि इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि घरेलू अनुसंधान एवं विकास, सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट उद्योग, कौशल विकास और नवाचार को समान गति से आगे बढ़ाया जाए। यदि इन क्षेत्रों में भी निरंतर और लक्षित निवेश हुआ तो भारत केवल मोबाइल फोन का निर्माण ही नहीं करेगा, बल्कि भविष्य की मोबाइल तकनीकों के विकास और निर्यात में भी अग्रणी भूमिका निभा सकेगा।

स्पष्ट है कि मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम केवल एक प्रोत्साहन योजना नहीं,बल्कि भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, नवाचार-आधारित और वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स महाशक्ति बनाने की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण आधार है। आने वाले वर्षों में यह योजना भारतीय उद्योग, रोजगार, निर्यात और तकनीकी नेतृत्व को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हुआ, तो यह पहल भारत को केवल दुनिया का बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि दुनिया का विश्वसनीय तकनीकी निर्माता और नवाचार केंद्र भी बना सकती है।

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