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रिजीम चेंज गुनाह नहीं, लोकतंत्र की जरूरत है

-सचिन कुमार गौतम

“रिजीम चेंज” यानी सत्ता परिवर्तन का शब्द इस समय मोदी सरकार को बुरी तरह डरा रहा है। वैसे इसे रिजीम चेंज कहें, सत्ता परिवर्तन कहें, “वोट चोर” का नारा लगाएं या “गद्दी छोड़” की मांग उठाएं—लोकतंत्र में ये जुमले गुनाह नहीं हैं। बल्कि ये लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। जनता ही तय करती है कि शासन करने का हक किसे दिया जाए और जब सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी न उतरे, तो उसे कब उतारा जाए। यह परिवर्तन जब तक अनैतिक तरीकों, गैरकानूनी कामों या हिंसा के बिना हो, तब तक उसे गलत नहीं कहा जा सकता।

लेकिन मोदी सरकार में जनता के विरोध को देशविरोध की तरह पेश किया जा रहा है। पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने “रिजीम चेंज” की बात पर विपक्ष को घेरने की कोशिश की। इसके बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपने विजयादशमी के भाषण में यही चिंता जताई और आंदोलन को गलत ठहराने की कोशिश की। इससे पहले संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने बांग्लादेश और फ्रांस का नाम लेकर भारत में उठ रहे विरोध-प्रदर्शनों को गलत साबित करने की कोशिश की थी। सवाल यह है कि जनता के सवालों का जवाब देने की बजाय उसकी आवाज को “खतरा” क्यों माना जा रहा है?

विरोध देशविरोध नहीं है

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वहां सत्ता किसी व्यक्ति, परिवार या पार्टी की निजी संपत्ति नहीं होती। सत्ता जनता से मिलती है और जनता के पास ही उसे बदलने का अधिकार रहता है। चुनाव इस अधिकार का सबसे शांतिपूर्ण और संस्थागत रूप है। लेकिन चुनाव के बाद भी जब जनता को लगता है कि सरकार उसके हितों के खिलाफ काम कर रही है, तो विरोध, प्रदर्शन, आंदोलन और सत्याग्रह उसका संवैधानिक और नैतिक अधिकार बन जाते हैं।

“रिजीम चेंज” का मतलब जरूरी नहीं कि हिंसा, तख्तापलट या गैरकानूनी तरीके से सरकार गिराना हो। लोकतंत्र में रिजीम चेंज का सबसे सही रास्ता वोट है। जनता अगले चुनाव में सरकार को बदल सकती है। इसके अलावा संसद, अदालत, प्रेस, सामाजिक संगठन और सड़क—ये सभी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। जब सरकार इन सबको “देशद्रोह” या “अराजकता” कहने लगती है, तो यह लोकतंत्र के प्रति उसके अविश्वास का संकेत बन जाता है।

यूरोप की तुलना कितनी उचित?

सत्ताधारी पक्ष विपक्ष के आंदोलनों को फ्रांस, इटली और अल्बानिया जैसे देशों की हिंसक घटनाओं से जोड़कर पेश कर रहा है। यह तुलना जानबूझकर भ्रामक है। सच यह है कि यूरोप के कई देशों में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। फ्रांस, इटली, बेल्जियम, स्पेन, पुर्तगाल, अल्बानिया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और ग्रीस में अलग-अलग विरोध देखे जा रहे हैं। इनमें फ्रांस, इटली और अल्बानिया की स्थिति विशेष रूप से तनावपूर्ण बताई जा रही है।

अल्बानिया में सरकार पर कार्रवाई न करने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में आग लगाने जैसी घटना हुई। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, योग्य शिक्षकों की कमी और शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ छात्र व शिक्षक सड़कों पर उतरे। जर्मनी में युवा अनिवार्य सैन्य सेवा से जुड़ी योजनाओं और नीतियों का विरोध कर रहे हैं। इटली के मिलान सहित कई शहरों में प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रूप भी लिया। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इन हिंसक हरकतों को अराजनीतिक उपद्रव और अराजकता कहा।

जिन देशों में सार्वजनिक संपत्ति तोड़ी जा रही है, पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले हो रहे हैं, वहां सरकारें इसे उपद्रव कहें तो समझा जा सकता है। लेकिन भारत की स्थिति इसके उलट है। यहां विपक्ष और जनता बार-बार शांतिपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने की कोशिश कर रही है। ऐसे में विदेशी हिंसा का हवाला देकर घरेलू विरोध को बदनाम करना गंभीर राजनीतिक चाल है।

जंतर-मंतर और पुलिस कार्रवाई

पिछले जुलाई में जंतर-मंतर पर हुई हिंसा को अलग रख दें, तो भी अक्टूबर में हुए विरोध प्रदर्शनों पर सवाल खड़े हैं। दिल्ली पुलिस पर आरोप है कि उसने न केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बल का इस्तेमाल किया, बल्कि उन्हें प्रताड़ित भी किया। इसके बावजूद भारतीय जनता जिस हिम्मत, धैर्य और सहनशक्ति से शांति व अहिंसा को अपने प्रदर्शन का हिस्सा बनाए हुए है, वह सराहनीय है।

सरकार जनता के इस विवेक और संयम का लगातार अपमान कर रही है। जनता बार-बार यह साबित कर रही है कि यह गांधी का देश बेकार का नहीं है। आज गांधी भी अगर वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठाते, तो संभव है कि उन्हें भी सलाखों के पीछे डाला जाता या उन पर लाठियां बरसाई जातीं। यह तुलना अतिशयोक्ति नहीं है; यह उस माहौल का संकेत है, जहां हर विरोध को साजिश और हर सवाल को षड्यंत्र कहा जाने लगा है।

विपक्ष की मांगें और सरकार की जवाबदेही

यह सही है कि विपक्ष सड़कों पर उतरा और उसके आह्वान पर जनता भी सड़क पर आई। इस समय मुख्य मांग यही है कि जिन लोगों ने वोटों की चोरी या चुनावी धांधली की है, उन्हें सत्ता में बैठने का नैतिक अधिकार नहीं है। अगर सरकार को इस आरोप से ऐतराज है, तो उसे आरोप लगाने वालों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय सबूत और जांच से अपनी पारदर्शिता साबित करनी चाहिए।

इसके लिए पहला कदम यह हो सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए। दूसरा, एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में उठ रहे गंभीर सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब दिया जाए। तीसरा, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए पुरानी व्यवस्था बहाल की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के अलावा देश के मुख्य न्यायाधीश भी चयन समिति में शामिल हों। चौथा, मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलने वाले आजीवन कानूनी संरक्षण का प्रावधान समाप्त किया जाए।

अगर मोदी सरकार ये कदम उठा ले, तो विपक्ष को आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एसआईआर की निष्पक्ष जांच होगी तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन जांच और पारदर्शिता की जगह विपक्ष को “अलोकतांत्रिक” कहकर बदनाम किया जा रहा है। यही सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी बन रही है।

संसद में जवाब क्यों नहीं?

पिछले जुलाई में जंतर-मंतर की हिंसा पर विपक्ष ने लोकतांत्रिक तरीके से ही मांग की थी कि गृहमंत्री सदन में जवाब दें। लेकिन पूरे मानसून सत्र में अमित शाह केवल आखिरी दिन लोकसभा में आए। वंदे मातरम् सुनकर वे चले गए, लेकिन जनता के सवालों का जवाब नहीं दिया। जुलाई से अक्टूबर आ गया, लेकिन यह सवाल अब भी खुला है कि पैलेट गन और एके-47 किसके आदेश पर चली।

अब नए सवाल भी जुड़ गए हैं। प्रदर्शन का लोकतांत्रिक अधिकार मोदी सरकार क्यों कुचल रही है? निहत्थे लोगों पर पुलिस लाठियां क्यों बरसा रही है? शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को प्रताड़ित क्यों किया जा रहा है? अमित शाह और नरेंद्र मोदी अगर संसद में आकर इन सवालों का जवाब दे दें, तो विपक्ष और सामाजिक संगठनों को सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जवाबदेही से भागना लोकतंत्र को कमजोर करता है; उसका सम्मान करना उसे मजबूत करता है।

गांधी का सत्याग्रह आज भी प्रासंगिक

जनता दरअसल वही कर रही है, जो गांधीजी ने रास्ता दिखाया था। 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार की जांच के लिए बनी हंटर कमेटी के सामने सुनवाई के दौरान सत्याग्रह का सवाल उठा था। 1920 में अहमदाबाद में गांधीजी हंटर कमेटी के सामने पेश हुए। कमेटी ने पूछा था कि यदि आजाद भारत में बहुमत से चुनी सरकार ऐसा कानून बनाए, जिसे कुछ लोग अन्यायपूर्ण मानते हों, तो क्या उन्हें अपनी ही चुनी सरकार के खिलाफ सत्याग्रह या सविनय अवज्ञा का अधिकार होगा?

गांधीजी ने स्पष्ट कहा था—हां, बिल्कुल होगा। उनके अनुसार यह लोगों का पवित्र कर्तव्य है कि यदि सरकार निरंकुश या भ्रष्ट हो जाए, तो उसके खिलाफ सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाया जाए। हिंसक विरोध लोगों का अधिकार नहीं होना चाहिए, लेकिन कानूनी सजा स्वीकार करते हुए सरकार पर नैतिक दबाव बनाना सत्याग्रह की पहचान है।

आज हिंदुस्तान के लोग यही कर रहे हैं। वे हिंसा नहीं चाहते; वे जवाब चाहते हैं। वे सत्ता नहीं छीनना चाहते; वे अपने वोट की गरिमा चाहते हैं। वे अराजकता नहीं फैलाना चाहते; वे लोकतंत्र बचाना चाहते हैं। अब भले ही भाजपा “रिजीम चेंज” और “रेजिस्टेंस” को गुनाह मान ले, लोकतंत्र के लिए यही दवा है और यही दुआ भी है।

सरकार के लिए रास्ता साफ है: या तो जनता के सवालों का जवाब दे, चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बहाल करे और विरोध के अधिकार का सम्मान करे—या फिर दबाव और आरोपों से लोकतंत्र को कमजोर करती रहे। इतिहास गवाह है कि जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। जो सत्ता जनता से मिलती है, उसे जनता के सामने ही जवाबदेह रहना पड़ता है।

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