लेखकांतिलाल मांडोतआधार केवल पहचान का माध्यम बने नागरिकता का...

आधार केवल पहचान का माध्यम बने नागरिकता का प्रमाण नहीं

-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot

-सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से अवैध घुसपैठ और दस्तावेजी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

भारत में आधार कार्ड आज सबसे व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले पहचान पत्रों में शामिल है। देश की बड़ी आबादी किसी न किसी सरकारी या निजी सेवा के लिए आधार का उपयोग करती है। बैंक खाता खोलने से लेकर मोबाइल सिम लेने तक और सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने से लेकर विभिन्न संस्थानों में पहचान साबित करने तक आधार एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका और उस पर हुई सुनवाई ने आधार की वैधानिक सीमाओं तथा उसके वास्तविक उद्देश्य को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों केंद्रशासित प्रदेशों चुनाव आयोग और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि आधार का उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में हो और उसे नागरिकता निवास जन्मतिथि अथवा पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए।
यह मामला केवल एक कानूनी तकनीकी प्रश्न नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ विषय भी है। याचिका में आधार अधिनियम 2016 की धारा 9 का उल्लेख किया गया है जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आधार संख्या नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद व्यवहार में अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों द्वारा आधार को नागरिकता और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। यही स्थिति अब न्यायिक जांच के दायरे में आई है।
आधार की मूल अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या उपलब्ध कराना थी ताकि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाई जा सके और फर्जी लाभार्थियों को रोका जा सके। आधार संख्या किसी व्यक्ति की बायोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय जानकारी से जुड़ी होती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करना है न कि उसकी राष्ट्रीयता निर्धारित करना। यही कारण है कि भारत में रहने वाला कोई विदेशी नागरिक भी निर्धारित शर्तों के अंतर्गत आधार संख्या प्राप्त कर सकता है। इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि आधार और नागरिकता दो अलग-अलग विषय हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें आधार के कथित दुरुपयोग की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आधार को कई स्थानों पर नागरिकता और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है जबकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता। यदि कोई दस्तावेज नागरिकता सिद्ध नहीं करता और फिर भी उसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में उपयोग किया जाता है तो इससे प्रशासनिक भ्रम और कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
इस मामले का एक संवेदनशील पक्ष अवैध घुसपैठ और अवैध प्रवासियों से जुड़ा है। देश के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध घुसपैठ का मुद्दा चर्चा में रहा है। समय समय पर यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ अवैध प्रवासी विभिन्न दस्तावेज प्राप्त कर भारतीय व्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेते हैं। यदि आधार को नागरिकता का प्रमाण मान लिया जाए तो ऐसी स्थितियों में गंभीर भ्रम उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि याचिका में इस विषय को राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बताया गया है।
हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि आधार स्वयं किसी अवैध गतिविधि का माध्यम नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब उसकी कानूनी सीमा से बाहर जाकर उसका उपयोग किया जाता है। आधार पहचान का प्रमाण है और उसी रूप में उसकी उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन जब उसे नागरिकता जन्मतिथि या निवास के अंतिम प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब विवाद पैदा होता है। इसलिए आवश्यकता आधार को कमजोर करने की नहीं बल्कि उसके सही उपयोग को सुनिश्चित करने की है।
चुनाव प्रक्रिया के संदर्भ में भी यह मामला विशेष महत्व रखता है। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता अत्यंत आवश्यक होती है। यदि किसी दस्तावेज को उसके वास्तविक उद्देश्य से अधिक महत्व देकर नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है तो मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं। इसी कारण चुनाव आयोग को भी इस मामले में पक्षकार बनाया गया है। अदालत यह जानना चाहती है कि विभिन्न प्रक्रियाओं में आधार का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है और क्या वह कानून के अनुरूप है।
यह विषय प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता की ओर भी संकेत करता है। देश में अनेक विभाग और संस्थाएं अलग-अलग नियमों के आधार पर दस्तावेज स्वीकार करती हैं। कई बार सुविधा के नाम पर ऐसे दस्तावेज भी स्वीकार कर लिए जाते हैं जो कानूनी रूप से उस उद्देश्य के लिए पर्याप्त नहीं होते। परिणामस्वरूप नागरिकों में भ्रम पैदा होता है और बाद में विवाद खड़े होते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करता है तो इससे देशभर में एकरूपता स्थापित हो सकती है।
आधार से जुड़े इस विवाद का दूसरा पक्ष आम नागरिकों की सुविधा से भी जुड़ा है। करोड़ों लोग आधार को सबसे आसान और उपलब्ध पहचान दस्तावेज मानते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय में यह संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा कि नागरिकों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। अदालत का उद्देश्य आधार के उपयोग को समाप्त करना नहीं बल्कि उसकी वैधानिक सीमाओं को स्पष्ट करना है ताकि भविष्य में कोई भ्रम न रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहचान और नागरिकता के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना किसी भी आधुनिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। पहचान यह बताती है कि व्यक्ति कौन है जबकि नागरिकता यह निर्धारित करती है कि वह किस देश का वैधानिक नागरिक है। दोनों की प्रकृति अलग है और इनके प्रमाण भी अलग होने चाहिए। यदि इन दोनों अवधारणाओं को मिलाया जाता है तो प्रशासनिक और कानूनी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्यों को जारी नोटिस इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत का हस्तक्षेप यह संदेश देता है कि कानून में जो व्यवस्था निर्धारित की गई है उसका पालन हर स्तर पर होना चाहिए। यदि आधार अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो व्यवहार में भी उसी सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए।
आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई देश की दस्तावेजी व्यवस्था और पहचान प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकती है। संभव है कि अदालत विभिन्न सरकारी विभागों और संस्थाओं के लिए नए दिशा-निर्देश जारी करे ताकि आधार के उपयोग की सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित हो सकें। इससे एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूती मिलेगी तो दूसरी ओर नागरिकों को भी यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि आधार का वास्तविक उद्देश्य क्या है।
 आधार भारत की डिजिटल पहचान व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और इसकी उपयोगिता पर कोई प्रश्न नहीं है। लेकिन किसी भी दस्तावेज की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका उपयोग उसी उद्देश्य के लिए किया जाए जिसके लिए उसे बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह प्रक्रिया केवल आधार कार्ड तक सीमित नहीं है बल्कि यह कानून के शासन प्रशासनिक जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विमर्श है। यदि इस अवसर पर स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाती है तो इससे देश की पहचान प्रणाली और अधिक मजबूत तथा विश्वसनीय बन सकेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)

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