नई दिल्ली, 15 जून (वेब वार्ता)। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अंतरराष्ट्रीय बाल कस्टडी विवाद में मां द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सिंगापुर में चल रही न्यायिक कार्यवाही और वहां पारित आदेशों की महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई, जिसके कारण यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं रह गई।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि चार वर्षीय बच्ची का जन्म और पालन-पोषण सिंगापुर में हुआ है। बच्ची ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार से पीड़ित है और उसे वहां विशेष चिकित्सा सुविधा, देखभाल तथा उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे में बच्ची के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखना उचित होगा।
मामले में याचिकाकर्ता सोम्या गोयल ने अपने पति राजरामन कार्तिक के खिलाफ याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया था कि उनके साथ क्रूर व्यवहार किया गया तथा बच्ची की देखभाल में लापरवाही बरती गई। उन्होंने अदालत से बच्ची को भारत लाने की अनुमति देने और उसकी अभिरक्षा उन्हें सौंपने की मांग की थी।
हालांकि, प्रतिवादी पक्ष की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि सिंगापुर की फैमिली जस्टिस कोर्ट इस मामले पर पहले ही विस्तृत सुनवाई कर चुकी है और आदेश भी पारित कर चुकी है। नवंबर 2025 में दिए गए अपने निर्णय में सिंगापुर की अदालत ने बच्ची को भारत लाने संबंधी मां की मांग को अस्वीकार कर दिया था।
सिंगापुर की अदालत ने अपने आदेश में बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति, उसके वजन में हुए सुधार, उपलब्ध चिकित्सकीय सुविधाओं और विशेष देखभाल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए पिता के पास उसकी अभिरक्षा बनाए रखना उचित माना था। अदालत ने यह भी पाया था कि बच्ची को वहां आवश्यक सहायता और उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा इन महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा न करना अदालत की विवेकाधीन अधिकारिता का दुरुपयोग है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष पूर्ण और सत्य जानकारी प्रस्तुत करनी चाहिए, विशेषकर तब जब मामला एक नाबालिग बच्चे के भविष्य और हितों से जुड़ा हो।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि हेबियस कॉर्पस याचिका का दायरा सीमित होता है और इसके माध्यम से बाल अभिरक्षा से जुड़े जटिल तथ्यात्मक विवादों की विस्तृत जांच संभव नहीं है। ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए पारिवारिक न्यायालय अधिक उपयुक्त मंच होता है, जहां साक्ष्यों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन किया जा सकता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह दोहराया कि किसी भी बाल अभिरक्षा विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत बच्चे का सर्वोत्तम हित होता है। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों और विदेशी न्यायालय के आदेशों को देखते हुए बच्ची की वर्तमान व्यवस्था में हस्तक्षेप करना उचित नहीं पाया गया।
इस निर्णय को अंतरराष्ट्रीय बाल अभिरक्षा विवादों में पारदर्शिता, न्यायिक सहयोग और बच्चे के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




