दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला, कोमा में पड़े सैनिक के मामले में आईवीएफ प्रक्रिया को दी अनुमति

नई दिल्ली, 16 अप्रैल, 2026 (वेब वार्ता)। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कोमा जैसी स्थिति में पड़े एक सैनिक के मामले में आईवीएफ प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा कि पहले दी गई सहमति को इस स्थिति में भी वैध माना जाएगा और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में बाधा नहीं बनना चाहिए।

यह फैसला न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सैनिक द्वारा पूर्व में दी गई सहमति और पत्नी की ओर से प्रस्तुत सहमति, दोनों को पर्याप्त आधार माना जा सकता है।

पत्नी की याचिका पर आया फैसला

मामला सैनिक की पत्नी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने अनुरोध किया था कि आईवीएफ प्रक्रिया के लिए उसके पति के आनुवंशिक नमूने को निकालने और सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं। अदालत ने असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी विनियमन अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी की सहमति को भी वैध माना जा सकता है।

याचिका में क्या कहा गया

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि जून 2023 में दंपति ने संतान प्राप्ति के लिए आईवीएफ प्रक्रिया अपनाने का निर्णय लिया था। लेकिन जुलाई 2025 में गश्त के दौरान सैनिक के साथ दुर्घटना हो गई, जिसमें वह ऊंचाई से गिर गया और उसके सिर में गंभीर चोट आई।

इस घटना के बाद सैनिक को गंभीर मस्तिष्क आघात हुआ और वह कोमा जैसी स्थिति में पहुंच गया। सेना के अस्पताल में इलाज के चलते आईवीएफ प्रक्रिया बीच में ही रोक दी गई। इसके बाद पत्नी ने अपने मातृत्व, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता के अधिकारों का हवाला देते हुए अदालत का रुख किया।

अदालत ने मौलिक अधिकार पर दिया जोर

अदालत ने अपने 13 अप्रैल के फैसले में कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह लगे कि सैनिक ने आईवीएफ प्रक्रिया के लिए सहमति नहीं दी थी। इसलिए पहले दी गई सहमति को ही पर्याप्त माना जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया गया तो पहले दी गई सहमति का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। न्यायालय के अनुसार, कानून की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए जिससे उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति हो, न कि वह बाधित हो।

प्रजनन स्वायत्तता को बताया मौलिक अधिकार

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रजनन संबंधी स्वायत्तता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसकी रक्षा करना आवश्यक है। कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो इस अधिकार को सशक्त बनाए।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संतान प्राप्ति अंततः भाग्य और प्रकृति पर निर्भर करती है, लेकिन किसी व्यक्ति के माता-पिता बनने के अधिकार को प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण रोका नहीं जाना चाहिए। इस फैसले को विशेषज्ञों ने संवैधानिक अधिकारों और आधुनिक चिकित्सा प्रक्रियाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

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