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जमीन दी उद्योग को, अब जवाब मांग रहे किसान: सीएसआर के खर्च से रास्ते, तालाब और रोजगार तक उठे सवाल

अमरोहा, 31 अक्टूबर। औद्योगिक विकास के लिए जमीन देने वाले किसानों और ग्रामीणों को बदले में क्या मिला, यह सवाल गजरौला में अब सीएसआर (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के खर्च से आगे बढ़कर रास्तों, तालाबों, स्थानीय रोजगार और पर्यावरणीय नुकसान तक पहुंच गया है। भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) ने टापी (पूर्व में टेवा एपीआई, उससे पहले जेके ड्रग्स) की इकाई के सीएसआर कार्यों और आसपास की सार्वजनिक संपत्तियों की स्थिति पर सवाल उठाते हुए जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने तीन दिन में जांच कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक करने को कहा है, अन्यथा तीन नवंबर को तिगरी में प्रस्तावित किसान महापंचायत में आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।
चौधरी के अनुसार संगठन के पास ऐसे कई किसानों की शिकायतें पहुंची हैं, जिनकी जमीन औद्योगिक इकाई के लिए ली गई थी। किसानों का सवाल है कि जमीन जाने के बाद उनके परिवारों और आसपास के गांवों की आर्थिक-सामाजिक हालत में कितना बदलाव आया और स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता तथा बुनियादी सुविधाओं के दावे कितने जमीन पर उतरे। संगठन का आरोप है कि सीएसआर के नाम पर खर्च का ब्योरा तो सामने आता है, लेकिन उसका असर धरातल पर नहीं दिखता। चौधरी ने कहा कि जल, जमीन और वायु पर पड़े असर की भरपाई संभव नहीं है, पर कंपनियों को अपनी सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी ईमानदारी से निभानी होगी।
विवाद का दूसरा पहलू सार्वजनिक रास्तों और जलस्रोतों का है। चौधरी का आरोप है कि तिगरिया भूड़ की ओर जाने वाला पुराना रास्ता बंद कर दिया गया है, जिसे प्रदेश के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय रमाशंकर कौशिक ने सरकारी धनराशि से बनवाया था। संगठन का यह भी कहना है कि चक रोड और तालाब फैक्ट्री परिसर में समायोजित कर लिए गए। भाकियू ने मांग की है कि राजस्व अभिलेखों, पुराने नक्शों और मौके की स्थिति का मिलान कराकर सार्वजनिक भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए और नियम विरुद्ध कब्जा मिलने पर रास्ता व तालाब ग्रामीणों के लिए बहाल हों।
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत निर्धारित सीमा में आने वाली कंपनियों को पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत सीएसआर पर खर्च करना होता है। कानून में संचालन वाले स्थानीय क्षेत्र और आसपास के इलाकों को प्राथमिकता देने की अपेक्षा है, पर खर्च को केवल उसी क्षेत्र तक सीमित रखना अनिवार्य नहीं है। कंपनी को अपनी वार्षिक रिपोर्ट में परियोजनाओं और खर्च का विवरण भी देना होता है। इसी आधार पर संगठन ने पिछले वर्षों के सीएसआर बजट, वास्तविक खर्च, परियोजनाओं, लाभार्थियों और कार्यस्थलों का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग की है।
दूसरी ओर कंपनी के आधिकारिक पेज पर अमरोहा के दारानगर गांव में 50 किलोवाट का सोलर माइक्रो ग्रिड स्थापित किए जाने का उल्लेख है। कंपनी के अनुसार 15 दिसंबर 2022 को शुरू हुई इस परियोजना से 210 परिवारों के एक हजार से अधिक लोगों को बिजली मिल रही है। यह गांव गजरौला संयंत्र से करीब 20 किलोमीटर दूर बताया गया है। ऐसे में सीएसआर के असर की परख के लिए घोषित परियोजनाओं के साथ संयंत्र के आसपास के प्रभावित गांवों की स्थिति भी देखनी होगी। संगठन के सवाल इसी पर हैं कि कुल कितनी राशि खर्च हुई, किन गांवों को प्राथमिकता मिली और ग्रामीणों को कितना लाभ पहुंचा।
संगठन ने जिलाधिकारी से राजस्व, उद्योग और संबंधित विभागों की संयुक्त जांच समिति गठित करने की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि तीन दिन में जांच शुरू कर रिपोर्ट सार्वजनिक न हुई तो धरना-प्रदर्शन होगा और आवश्यकता पड़ने पर गजरौला-चांदपुर स्टेट हाईवे-51 पर जाम लगाने का निर्णय भी लिया जा सकता है। इस संबंध में कंपनी का पक्ष अभी उपलब्ध नहीं हो सका है।
तीन नवंबर की तिगरी किसान महापंचायत, जिसमें किसान युवा संसद भी शामिल है, में गंगा मेले से जुड़ा मुद्दा भी उठेगा। संगठन ने वीआईपी मार्ग पर साधु-संतों के अन्न क्षेत्रों और धार्मिक शिविरों के लिए आरक्षित सेक्टर चार में लोहे के शौचालयों की वेल्डिंग करने वाले ठेकेदार को निजी कार्यशाला के लिए स्थान दिए जाने पर आपत्ति जताई है और यह जगह साधु-संतों, अखाड़ों व भंडारों के लिए बहाल करने की मांग की है। संगठन ने मेले के बजट से अकेले सड़कों के निर्माण पर दो करोड़ रुपये खर्च का थर्ड पार्टी ऑडिट कराने की भी मांग रखी है। जमीन, रास्ते, तालाब, रोजगार और सार्वजनिक धन के खर्च से जुड़ा यह पूरा प्रकरण औद्योगिक विकास और स्थानीय हितों के बीच जवाबदेही की कसौटी बन गया है। उद्योग रोजगार और राजस्व लाते हैं, पर जिन गांवों की जमीन और संसाधनों पर विस्तार होता है, वहां सुविधाओं, सार्वजनिक संपत्ति और पर्यावरण की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। अब देखना है कि जांच की मांग केवल सीएसआर खर्च तक सिमटती है या जमीन, रास्ते, तालाब और रोजगार के सभी पहलू एक साथ परखे जाते हैं।

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