विवाह दो परिवारों के बीच एक मजबूत बंधन है: डॉ. सतीश सिकरवार ने बताया कन्यादान का महत्व

ग्वालियर, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता

ग्वालियर में डाॅ. सतीश सिकरवार ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच एक मजबूत बंधन है। भारतीय संस्कृति में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक माना गया है, जो सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विवाह का उद्देश्य केवल दांपत्य जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि वंशवृद्धि, सामाजिक जिम्मेदारी और आध्यात्मिक समृद्धि भी है।

कन्या विवाह: भारतीय संस्कृति का पवित्र संस्कार

हिंदू संस्कृति में कन्या का विवाह एक पवित्र संस्कार है, जो दो आत्माओं और दो परिवारों को जोड़ता है। इसमें कन्यादान सबसे भावुक और महत्वपूर्ण रस्म है, जहाँ पिता अपनी पुत्री की जिम्मेदारी वर को सौंपते हैं। यह महादान, विश्वास और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। कन्यादान का अर्थ बेटी को वस्तु की तरह देना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा और जिम्मेदारी को वर को सौंपना है, ताकि वह जीवनभर उसकी देखभाल करे और सम्मान दे।

पिता के लिए भावनाओं से भरा क्षण

विवाह के दौरान पिता के लिए सबसे भावुक क्षण विदाई का होता है, जब वह अपनी बेटी को नए घर भेजते हैं। यह क्षण खुशी और जुदाई का मिश्रण होता है। एक पिता के लिए बेटी के विवाह का अर्थ होता है गर्व, भावनाएं और विदाई का दर्द एक साथ महसूस करना। पिता अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनने, नए परिवार में सामंजस्य स्थापित करने और प्रेमपूर्वक जीवन व्यतीत करने का आशीर्वाद देता है।

  • कन्या विवाह भारतीय संस्कृति का प्रमुख संस्कार है।
  • कन्यादान को सर्वोच्च दान माना गया है।
  • पिता के लिए बेटी की विदाई सबसे भावुक क्षण होती है।

आधुनिक दृष्टिकोण से विवाह का महत्व

आज के दौर में विवाह केवल रस्मों तक सीमित नहीं है। अब शिक्षित और आत्मनिर्भर कन्याएं अपने जीवनसाथी के चयन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। विवाह को एक पवित्र यज्ञ की तरह देखा जाता है, जहाँ वर और वधू दोनों मिलकर एक नए जीवन की शुरुआत करते हैं। यह परंपरा विश्वास, प्रेम और समर्पण की आधारशिला पर टिकी हुई है, जिसे समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

जन उत्थान न्यास की प्रेरणादायक पहल

डाॅ. सतीश सिकरवार ने बताया कि जन उत्थान न्यास के माध्यम से विवाह और निकाह एक ही पांडाल में ईश्वर की कृपा से संपन्न हो रहे हैं। इस सामाजिक पहल में सर्वहारा वर्ग की भागीदारी देखकर उन्होंने कहा कि यह आयोजन सामाजिक एकता और सौहार्द का प्रतीक है। उन्होंने सभी को इस नेक कार्य के लिए धन्यवाद दिया।

निष्कर्ष: विवाह जीवन का आध्यात्मिक और सामाजिक बंधन

डाॅ. सतीश सिकरवार का कहना है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का मिलन है। यह परंपरा भारतीय जीवन दर्शन की आत्मा को दर्शाती है, जो प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी पर आधारित है। उन्होंने कहा कि विवाह को केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक बंधन के रूप में समझना चाहिए।

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