-शादाब खान
भोपाल, 27 अप्रैल (वेब वार्ता)। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जमीन संबंधी विवाद लगातार गहराते जा रहे हैं। शहर की सीमा में 151 गांवों को शामिल करने के बाद भूमि रिकॉर्ड के सही प्रबंधन में हुई लापरवाही अब बड़े संकट का रूप ले चुकी है। स्थिति यह है कि करीब 70 हजार खसरों पर विवाद खड़े हो गए हैं, जो कुल खसरों का लगभग आधा हिस्सा है। इससे आम नागरिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
शहरी विस्तार के दौरान जिन गांवों को शहर में जोड़ा गया, वहां जमीन का रिकॉर्ड अब भी पुराने खसरा आधार पर ही संचालित हो रहा है। जबकि शहरी क्षेत्रों में प्लॉट और ब्लॉक नंबर के आधार पर जमीन का स्पष्ट निर्धारण होना चाहिए था। इस चूक के कारण अब हर दूसरे प्लॉट पर सीमा विवाद देखने को मिल रहा है और राजस्व न्यायालयों में बड़ी संख्या में मामले दर्ज हो रहे हैं।
कोलार क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां राजहर्ष कॉलोनी के आठ सेक्टर तीन गांवों की जमीन पर विकसित किए गए। वर्ष 2014 में यह क्षेत्र नगर सीमा में शामिल हुआ, लेकिन जमीन की पहचान खसरों के आधार पर ही बनी रही। परिणामस्वरूप वर्तमान में लगभग 12 हजार प्लॉट विवाद की स्थिति में हैं, जिससे रहवासियों में असंतोष बढ़ रहा है।
रिटायर्ड एडीएम वीके चतुर्वेदी के अनुसार वर्ष 2011 में भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण के बाद समस्याएं और बढ़ गईं। उनका कहना है कि जब ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी सीमा में शामिल किया गया, तभी जमीन को व्यवस्थित रूप से ब्लॉक और प्लॉट में विभाजित कर देना चाहिए था। ऐसा नहीं होने से अब विवाद व्यापक रूप ले चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान के लिए जियो मैपिंग के आधार पर तैयार डिजिटल रिकॉर्ड का पुराने नक्शों से भौतिक सत्यापन किया जाना जरूरी है। साथ ही अरेरा कॉलोनी जैसी व्यवस्थित कॉलोनियों के मॉडल को अपनाकर जमीन का पुनः निर्धारण किया जा सकता है, जिससे विवादों का स्थायी समाधान संभव होगा।
इस पूरे मामले पर कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने कहा कि लैंड रिकॉर्ड में गड़बड़ी और खसरों की मिसमैचिंग की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रत्येक शिकायत को गंभीरता से लेकर उसका शीघ्र निराकरण किया जाए।
क्या होता है खसरा
खसरा एक राजस्व शब्द है, जिसे गाटा संख्या भी कहा जाता है। यह जमीन के एक विशिष्ट हिस्से को दिया गया पहचान नंबर होता है। इसमें भूमि का क्षेत्रफल, मालिक का नाम, फसल का विवरण, मिट्टी का प्रकार और सिंचाई की जानकारी दर्ज होती है। यह जमीन के स्वामित्व का प्रमुख दस्तावेज माना जाता है और किसी भी प्रकार के लेन-देन में अनिवार्य होता है।



